भारत की तलाश

 

Sunday, May 4, 2008

सावधान! हमारी थाली पर अमेरिकी राष्ट्रपति की नजर है!!

इस ख़बर को पढ़ कर, हिन्दी फिल्म में अभिनेता गोविंदा पर फिल्माए गए, शरारत भरे गीत के बोलों की याद आ गयी " ... तुझको मिर्ची लगी तो मैं क्या करूं?"। फिर डर भी लगा कि अफगानिस्तान, ईराक़ के बाद कहीं इनकी आँख इधर तो नहीं! मीडिया में खबरें आयी हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश का, अपनी विदेश मंत्री कोंडोलीजा राइस की तरह मानना है कि भारतीय मध्यम वर्ग के खानपान की वजह से ही दुनिया भर में कीमतें बढ़ रही हैं। भारत पर महंगाई का इल्जाम मढ़ते हुए बुश यह भी भूल गए कि सारी दुनिया अमेरिका में खाद्यान्न की जगह बायो फ्यूल के लिए बढ़ती खेती को कोस रही है। उन्हें जब इसकी याद दिलाई गई तो उन्होंने इस आरोप को सिरे से खारिज कर दिया।

'अमेरिका में अर्थव्यवस्था' पर एक बातचीत के दौरान बुश ने कहा , ' भारत जैसे देशों में बढ़ती संपन्नता अच्छी बात है , लेकिन इस वजह से वहां अच्छे खाने की मांग बढ़ रही है। यह हमारे लिए अच्छा है क्योंकि हमें वहां अपना माल बेचने का मौका मिलेगा , लेकिन इससे मांग बढ़ेगी। मसलन भारत में मध्यम वर्ग की आबादी 35 करोड़ से ज्यादा है , जो अमेरिका की कुल जनसंख्या से ज्यादा है। जब पैसे ज्यादा आते हैं तो अच्छे खाने की मांग भी बढ़ती है और इस वजह से कीमतें बढ़ रही हैं। '

बुश के इस बयान पर भारत में कड़ी प्रतिक्रिया हुई है। वाणिज्य मंत्री कमलनाथ ने कहा कि अमेरिका जैसे विकसित देशों की कृषि सब्सिडी के कारण विकासशील देशों में कृषि में निवेश घाटे का सौदा बन गया और अनाज पैदा करने की उनकी क्षमता मारी जा चुकी है। सीपीआई के डी . राजा के मुताबिक भारत और चीन में खाने की मांग बढ़ी है , लेकिन इसमें गलत क्या है ? हम अमेरिकी राष्ट्रपति के आगे हाथ नहीं फैला रहे हैं। वाणिज्य राज्य मंत्री जयराम रमेश ने कहा कि बुश की इकॉनमिक्स कमजोर रही है और उन्होंने यह बात फिर साबित कर दी। उधर सीपीएम के प्रकाश कारत ने कहा कि भारत में लाखों लोगों के पास खाने के लिए नहीं है , यह बयान उनका अपमान करता है।

2 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

यह हमारे लिए गर्व की बात है कि हमारे यहाँ अन्न की खपत बढ़ी है। अभी तो अन्न केवल आधी आबादी तक पहुँचा है अभी शेष आधी तक और पहुँचाना है।

दिनेशराय द्विवेदी said...

आप की बात सोलहों आने सही है।