भारत की तलाश

 

Tuesday, December 9, 2008

नर्सरी के फार्म बेचकर दिल्ली के पब्लिक स्कूलों ने 5000 करोड़ रुपए कमाये: ASSOCHAM

दस दस स्कूलों का चक्कर लगाकर हजार दो हजार में फार्म खरीदने वाले तमाम अभिभावकों को यह जानकर हैरत होगी कि केवल नर्सरी कक्षा के फार्म बेचकर ही पब्लिक स्कूलों ने अरबों रुपए की कमाई कर डाली है। व्यावसायिक और औद्योगिक गतिविधियों पर नजर रखने वाले उद्योग चैंबर (ASSOCHAM) के सामाजिक विकास न्यास ने पाया कि नर्सरी कक्षा के दाखिला फार्म बेचकर ही दिल्ली के पब्लिक स्कूलों ने 5000 करोड़ रुपए की कमाई की है। ASSOCHAM अध्ययन के मुताबिक पिछले आठ सालों में नर्सरी और केजी के दाखिला फार्म की बिक्री में कम से कम 300 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हुई है। अपने नौनिहालों को अच्छे से अच्छे स्कूल में दाखिला दिलाने के लिये आमतौर पर प्रत्येक अभिभावक फार्म खरीदने में ही 5000 रुपए तक खर्च कर डालते हैं।

वर्ष 2000 में जहां दिल्ली के बडे स्क़ूल दाखिले से संबंधित फार्म और दस्तावेज मात्र 300 रुपए में बेच रहे थे, वहीं 2008 में यही स्कूल कम से कम 1000 रुपए में फार्म बेच रहे हैं। एसोचैम महासचिव डी.एस. रावत का कहना है कि दो बच्चों के दाखिले की बात हो तो फिर खर्च और भी बढ़ जाता है। रावत का कहना है कि नर्सरी और केजी में दाखिले के फार्म तो अब बडे-बडे प्रबंधन संस्थानों, इंजीनियरिंग कालेजों और चार्टर्ड एकाउंटेंट संस्थानों के दाखिला फार्म से भी महंगे हो गये हैं। एसोचैम रिपोर्ट के मुताबिक अकेले दिल्ली के ही पब्लिक स्कूलों ने नर्सरी के दाखिला फार्म बेचकर 5000 करोड़ रुपए की कमाई कर डाली है।

अध्ययन में कहा गया है कि आमतौर पर अभिभावक दखिला फार्म के साथ मिलने वाली पुस्तिका को लेने से इंकार नहीं करते हैं क्योंकि इसमें स्कूल के बारे में पूरी जानकारी होती है, लेकिन अब ज़्यादातर स्कूलों ने इसके दाम काफी बढ़ाचढ़ाकर रखना शुरू कर दिया है, जिससे अभिभावकों को मजबूरी में अधिक दाम चुकाकर भी इन्हें खरीदना पड़ता है। ऊपर से यह भी गारंटी नहीं होती कि उस स्कूल में उनके बच्चे को दाखिला मिल ही जाएगा। इसलिए अभिभावकों को कम से कम तीन चार स्कूलों में फार्म भरने पड़ जाते हैं। एसोचैम का कहना है कि ऐसे समय जब पूरी दुनिया में आर्थिक मंदी का दबाव है। उद्योगों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में कामकाज धीमा पड़ रहा है। कई उद्योगों से कर्मचारियों की छंटनी हो रही है और ऊंचे वेतन भत्तों में कटौती की जा रही है निजी पब्लिक स्कूलों की बढ़ती लागत पर अंकुश लगना चाहिए।

दाखिला फार्म की कीमत में भारी वृध्दि न्यायालय के उस आदेश का भी उल्लंघन है, जिसमें उन्हें सालाना वृध्दि 40 प्रतिशत के दायरे में रखने को कहा गया है। रावत कहते हैं कि आमतौर पर सभी पब्लिक स्कूल फीस वृध्दि के लिए छठे वेतन आयोग की वेतन वृध्दि का हवाला देते हैं, जो कि पूरी तरह से अन्यायपूर्ण है, ज़्यादातर स्कूलों में काम करने वाले कर्मचारियां को असंगठित क्षेत्र के रूप में काम दिया जाता है जिन्हें वेतन वृध्दि को कोई लाभ नहीं मिलता।

इस सम्बन्ध में ASSOCHAM की प्रेस विज्ञप्ति यहाँ देखी जा सकती है

4 comments:

Unknown said...

स्कूल और अस्पताल दो सबसे बेहतरीन "धंधे" हैं…

अनुनाद सिंह said...

बाप रे! शिक्षा की नींव ही भ्रष्टाचार से !

ghughutibasuti said...

हाँ, यह एक ऐसा धंधा है जो कभी मंदा नहीं पड़ता ।
घुघूती बासूती

राज भाटिय़ा said...

वो लोग बेबकुफ़ है जो इन धोखे वाजो के चक्कर मै आते है, क्या सरकारी स्कुलो मे पढाई नही होती ??? फ़िर इन स्कुलो मे तो पढाई का स्तर बहुत ही घटिया है, सिर्फ़ दिखावे के लिये लोग अपने बच्चो को यहां दाखिल करवाते है,