भारत की तलाश

 

Thursday, September 3, 2009

रंगरेलियां मनाने से मना किया तो छात्र-छात्रा ने पुलिस वाले को कार से कुचल कर मार डाला

जबलपुर का एक किस्सा सामने आया है जिसमें कार में रंगरेलियां मनाने से मना करने पर गुस्साए छात्र-छात्रा ने एक पुलिसकर्मी की कार से कुचलकर हत्या कर दी। कैंट थाना इंचार्ज अखिल वर्मा ने मीडिया को बताया कि 2 सितम्बर की रात गोलछा कम्पाउंड के पास एक कार काफी देर से खड़ी थी जिसमें एक युवक और युवती रंगरेलियां मना रहे थे। कैंट थाने में तैनात देवीसिंह परोहा ने युवक-युवती से कार में रंगरेलियां करने से मना किया तो युवक नाराज हो गया और उसने पुलिसकर्मी को कार से कुचल दिया जिससे उसकी मौत हो गई।

पुलिस ने कार लेकर भाग रहे युवक-युवती को पीछा कर उन्हें बेलबाग थाना क्षेत्र में पकड़ लिया। छात्र की पहचान हितकारणी इंजीनियरिंग कालेज के थर्ड ईयर में पढ़ने वाले के रुप में हुई है। वह गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) का रहने वाला है जबकि युवती की पहचान होम साइंस कालेज में सेकंड ईयर में पढ़ने वाली के रुप में हुई है। वह हॉस्टल में रहकर पढ़ रही है। युवक-युवती को गिरफ्तार कर उनके खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया गया है।

Wednesday, September 2, 2009

अनाथालय की छह वर्षीय बालिका द्वारा रात में बिस्तर गीला: अधिकारियों ने गरम लोहे की छड़ से दागा

तिरूवनन्तपुरम में छह वर्षीय बालिका द्वारा रात में बिस्तर गीला कर देने पर अनाथालय के अधिकारियों ने बालिका को गरम लोहे की छड से दाग दिया। बालिका के रिश्तेदार की शिकायत पर पुलिस ने अनाथालय के अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है। पुलिस सूत्रों के अनुसार घटना का पता उस समय चला जब ओणम पर्व के लिए हुई छुटिटयों में बालिका के रिश्तेदार उसे घर लाए। रिश्तेदारों ने जब उसकी छाती और बांह पर जले के निशान देखे तो उससे पूछताछ की। जवाब में बालिका ने कहा कि बिस्तर गीला कर देने पर अनाथालय के अधिकारियों ने उसे यह सजा दी है। हालांकि अनाथालय अधिकारियों ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा है कि गरम चाय गिरने से वह जली है।

Tuesday, September 1, 2009

नकली नोट पकड़ने की अनूठी मशीन, भारत के वैज्ञानिकों ने बनाई

नकली नोट से भारतीय अर्थव्यवस्था को तहस नहस करने की साजिश रचने वालों के दिन शायद खत्म होने पर आ गये हैं। भारत में बनी आटोमेटिक काउटरफीट करेंसी डिटेक्टर मशीन इसी नवंबर में बाज़ार में उतरने जा रही है। चंडीगढ़ के केंद्रीय वैज्ञानिक उपकरण संगठन (CSIO) के वैज्ञानिकों द्वारा इस मशीन को बनाया गया है। इसमें छह सेंसर लगे हैं। वैज्ञानिकों का दावा है कि छह सेंसर वाली यह पहली मशीन होगी। इससे पहले एक सेंसर वाली मशीनें बाजार में उपलब्ध हैं।


नवंबर में लांच होने वाली मशीन नोट के विभिन्न पक्षों कागज, छपाई, हस्ताक्षर, फोटो, नंबर व वाटर प्रिंट को एक साथ पढ़ने में सक्षम है। इसमें एक मिनट में एक हजार नोटों की परख एवं गिनती एक साथ की जा सकती है। नकली नोट रखते ही इसमें लगा अलार्म बजने लगता है। अलार्म तब तक बंद नहीं होता जब तक नोट मशीन से बाहर नहीं निकाल लिया जाता। रिजर्व बैंक और स्टेट बैंक में नई तकनीक के कई सफल परीक्षण भी किए जा चुके है। नई तकनीक यूनाइटेड स्टेट पेटेट एप्लीकेशन पब्लिकेशन और व‌र्ल्ड इटलैक्चुअल प्रापर्टी आर्गेनाइजेशन-विप्रो से पेटेट भी कराया जा चुका है। सीएसआईओ ट्रेक्नोलाजी ट्रांसफर की प्रक्रिया 26 सितंबर को की जाएगी। सुरक्षा कारणों से अभी कंपनी के नाम की घोषणा नहीं की जा रही है।

सीएसआईओ के वैज्ञानिक एचके सरदाना के मुताबिक नकली नोट पकड़ने वाली इस मशीन में 3+3 की तर्ज पर छह सेंसर लगे है। नकली नोट को गारंटी के साथ पकड़ने में मशीन कामयाब है। उन्होंने बताया कि करीब पांच साल के अनुसंधान के बाद इस तकनीक को ईजाद किया गया है। इस प्रोजेक्ट में अब तक 50 लाख रुपये खर्च हुए है। मशीन का साइज ए4 है और माडल पोर्टेबल, कीमत 45 से 50 हजार रुपये के बीच है।




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बिना जरूरत ही खरीद डालीं 130 करोड़ की दवाएं!!

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में करोड़ों रुपये का घोटाला करने के आरोप में फंसे झारखंड के पूर्व स्वास्थ्य सचिव प्रदीप कुमार सहित कई आरोपियों के ठिकानों पर 31 अगस्त को सीबीआई ने छापा मारा। सीबीआई के अनुसार कुमार ने दवा आपूर्ति करने वाले नौ लोगों के साथ मिल कर मिशन के लिए ऐसी दवाइयां खरीदीं जिनकी जरूरत ही नहीं थी। इन दवाओं की खरीद के लिए सारे नियम-कायदों की भी धज्जियां उड़ा दी गई। 1991 बैच के आईएएस कुमार गत जून तक तक झारखंड में स्वास्थ्य सचिव थे। वह फिलहाल संस्थागत वित्त सचिव के पद पर हैं।


सीबीआई के अनुसार कुमार के साथ मिल कर इन लोगों ने एक साजिश के तहत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के लिए ऐसी दवाइयां खरीदीं जिनकी जरूरत ही नहीं थी। ये दवाइयां 2008 के दौरान प्रदीप के स्वास्थ्य सचिव रहते हुए खरीदी गई थीं। 130 करोड़ रुपये से ज्यादा की ये दवाइयां भंडार गृह में रखे-रखे खराब हो गई। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के लिए खरीदे गए महंगे उपकरणों का भी उपयोग नहीं किया जा सका।

Monday, August 31, 2009

पिता ने पार्टी में जाने नहीं दिया तो बेटियों ने बलात्कार का आरोप लगवा कर फंसवा दिया

मुंबई के मीरा रोड में रहने वाले मनोज पटेल को जिम्मेदार पिता बनने पर बेटियों ने ऐसी सजा देने की ठानी की रिश्तों की सारी मर्यादाएं तार-तार हो गईं। जिम्मेदार पिता होने के नाते मनोज अपनी दोनों नाबालिग बेटियों को बेवजह बाहर आने-जाने और मौज मस्ती से मना करते थे। इससे नाराज बेटियों ने उन पर दो साल पहले बलात्कार का आरोप लगा दिया था। दो साल तक इस कलंक के साथ जीने के बाद ठाणे सेशन कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया है। बिना अपराध किए जेल जाने और शर्मसार होने के बावजूद उन्होंने बेटियों को माफ कर दिया है। 29 अगस्त को रिहा होने के बाद कहा कि उन्होंने बेटियों ने जो किया, उसकी उन्हें तब समझ नहीं थी।


नवभारत टाईम्स के मुताबिक मामला यह था कि 31 दिसंबर, 2007 की रात पिता ने नए साल के जश्न की जगह बेटियों को घरेलू प्रार्थना में हिस्सा लेने को कहा था। वे प्रार्थना में गईं तो जरूर, लेकिन उसी दिन पिता को सबक सिखाने का प्लान बना लिया। अगले दिन दोनों ने भयंदर पुलिस से शिकायत की। पुलिस ने छेड़छाड़ का मामला दर्ज कर राकेश को गिरफ्तार कर लिया। जमानती मामला होने के कारण बेटियों ने दोबारा पुलिस से संपर्क किया। उन्हें डर था कि छूटने के बाद पिता बख्शेंगे नहीं। आरोप है कि इसी दौरान एक एनजीओ की कुछ महिलाओं ने उनसे संपर्क किया। इसके बाद ही बेटियों ने बलात्कार का आरोप लगा दिया।

मनोज को सात महीने बाद जमानत मिल सकी थी। इस बीच उनकी पत्नी को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। मां पर रेप की बात छुपाने के आरोप लगा था। लेकिन उनके वकील ने अदालत में दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया। उन्होंने शिकायत में बताए गए समय को झूठा साबित किया और मेडिकल रिपोर्ट में कई कमियां उजागर कीं। लिहाजा कोर्ट ने मनोज को बरी कर दिया।

लेकिन जो दाग 46 वर्षीय मनोज पर लगे हैं, वह उससे आहत हैं। पुराने निवास पर जाने के नाम से ही उन्हें डर लगने लगता है। बेटियों से उनकी बातचीत तो होती रहती है, लेकिन वे अलग- अलग रह रहे हैं।

Saturday, August 22, 2009

महिला फौजी अधिकारियों को पेंशन नहीं, मेडिकल सुविधा नहीं; फौज़ में शामिल होने का मलाल इन्हें

तीनों सेनाओं की सर्वोच्च सेनापति भले ही एक महिला हों, लेकिन उनके मातहत काम कर रही भारतीय रक्षा सेनाओं में महिलाएं समान हक के लिए अब भी छटपटा रही हैं। रक्षा मंत्रालय की नाकाम नीतियों के कारण अल्प सेवा कमीशन की महिला अधिकारी सेवा छोड़ने को मजबूर हैं। दैनिक जागरण में प्रणव उपाध्याय की एक दिलचस्प रिपोर्ट है कि अपने ही संगठन की बेरुखी के चलते तीनों सेनाओं की करीब ढाई हजार महिला अधिकारियों को अब इंतजार है दिल्ली हाईकोर्ट में होने वाली सुनवाई का। जहां सरकार को यह बताना है कि तीन सेवा विस्तार और 14 साल की सेवा के बावजूद इन अधिकारियों को सेना क्यों न तो स्थायी कमीशन दे रही है और न ही सेवानिवृत्ति के लाभ। सुनवाई पर भी यदि सालीसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम सरकार की नीति साफ करने में नाकाम रहे तो शायद नौ और महिला अधिकारी 25 अगस्त को सेना से खाली हाथ रुखसत हो जाएंगी।


महिलाओं को स्थायी कमीशन न देने को लेकर सरकार के तर्क भी कम रोचक नहीं हैं। न्यायालय में बीते तीन साल से चल रही सुनवाई में सरकार ने कभी अमेरिकी सेना के माडल का हवाला दिया तो कभी इन अधिकारियों के कम प्रशिक्षण का। महिलाओं को स्थायी कमीशन न दे पाने के लिए सरकार ने यहां तक कहा कि इनके युद्धबंदी बनने पर काफी फजीहत हो सकती है। हालांकि कोर्ट का रुख देखते हुए अगली सुनवाई में सरकार ने अपनी नीति स्पष्ट करने का भरोसा जरूर दिलाया है।

नब्बे के शुरुआती दशक में महिलाओं के लिए अल्प सेवा कमीशन के रास्ते खोले गए। आरंभिक पांच साल की सेवाओं के बाद इन अधिकारियों को पहले पांच साल और बाद में चार साल का सेवा विस्तार दिया गया। लेकिन अब, प्रयोग के तौर पर अधिकारी बनाई गई इन महिला अफसरों को रक्षा मंत्रालय 14 साल की सेवा के बाद चलता कर रहा है। विदाई भी ऐसी कि फौज को अपने उम्र के बेहतरीन साल देने के बाद इन महिला अफसरों के हाथ न तो पेंशन है, न मेडिकल सुविधाएं और न ही पूर्व सैनिक का दर्जा। है तो बस एक रिलीज आर्डर। हालत यह है कि मार्च 2008 में सेना से बाहर हुई मेजर अंकिता श्रीवास्तव अब बायो-डाटा लिए नौकरी की तलाश में भटकने को मजबूर हैं। डेढ़ साल से बेरोजगार मेजर श्रीवास्तव किसी पद के लिए अति शिक्षित हैं तो कहीं उम्र के पैमाने पर अनफिट। कभी मिस इलाहाबाद रही शहर की पहली महिला फौजी अधिकारी को अब सेना में शामिल होने का ही मलाल है।

दो फीसदी विधवा कोटे से सेना में शामिल हुई महिला अधिकारियों की मुसीबत दोहरी है। अपना पति खोकर सेना के सहारे पारिवारिक जिम्मेदारियां निभा रही इन अधिकारियों के पास तो अधेड़ उम्र की बेरोजगारी से निपटने के लिए जीवनसाथी का संबल भी नहीं है। न्यायालय का दरवाजा खटखटाने वाली सेना और वायुसेना की 58 अधिकारी भारतीय रक्षा सेनाओं पर सीधे लिंगभेद का आरोप लगाती हैं। चंद दिनों पहले सेवामुक्त हुई पूर्व विंग कमांडर स्मृति शर्मा कहती हैं कि 'महिलाओं के लिए ना तो सेवा शर्तो में कोई छूट है और ना ही सेवा स्थितियों में रियायत। लेकिन, जब बारी सेवा लाभ देने की आती है तो हमें हर बार पीछे धकेला जाता है। यह सब तब जब रक्षा सेनाओं में अफसरों के 24 हजार से ज्यादा पद खाली पड़े हैं। एक सेवारत महिला अधिकारी कहती हैं कि 'इस बारे में रक्षामंत्री, रक्षा राज्यमंत्री, यूपीए अध्यक्ष और राष्ट्रपति का दरवाजा खटखटाया जा चुका है। हर कोई मामले से सहानुभूति तो जताता है लेकिन अब तक कोई ठोस नीति नहीं बन पाई है।' महिला अफसरों के मुताबिक उनके स्थायी कमीशन की राह में सबसे बड़ा रोड़ा रक्षा बलों के मुखियाओं का रुख है।

Thursday, August 13, 2009

रेलवे की नौकरी के लिए परीक्षा का प्रश्नपत्र हिन्दी में नहीं होगा!!

भई वाह! रेलवे की नौकरी के लिए परीक्षा हो और उसका प्रश्नपत्र हिन्दी में न हो, क्या ऐसा संभव है? अभी तक तो नहीं था, लेकिन स्वतंत्रता दिवस के दो दिन पहले यह खबर है कि रेल मंत्रालय ऐसा करने की तैयारी में है। खबरें बताती हैं कि रेलमंत्री ममता बनर्जी ने मंत्रालय संभालने के बाद यह नोटिस जारी किया कि रेलवे की परीक्षाएँ अँगरेजी या क्षेत्रीय भाषा में कराई जाएँ।


अभी तक रेलवे में भर्ती के लिए ग्रुप-डी की परीक्षाएँ अँगरेजी, हिन्दी और क्षेत्रीय भाषा में होती हैं। ग्रुप-सी की परीक्षाएँ अँगरेजी और हिन्दी में होती हैं। इसमें क्षेत्रीय भाषाओं को भी शामिल करने की बात लंबे समय से हो रही थी। इससे किसी को असहमति नहीं थी, पर हिन्दी को दरकिनार किए जाने की कोशिशों से हड़कंप मचा हुआ है। परीक्षाओं में क्षेत्रीय भाषाओं को शामिल करने और हिन्दी को बाहर का रास्ता दिखाने या किनारे करने के लिए मंत्रालय ने बाकायदा एक उच्च स्तरीय कमेटी का गठन किया है। जब रेल मंत्रालय से आधिकारिक राय जानने की कोशिश की गई तो उन्होंने बस इतना माना कि एक कमेटी का गठन हुआ है।

अधिकारियों ने इतना कहा कि ऐसा होने पर नीतिगत बयान आएगा और फिर उसकी मंजूरी मंत्रिमंडल से लेना पड़ेगी। दिलचस्प यह है कि ऐसी किसी पहल से उन्होंने इनकार भी नहीं किया। हालाँकि एक वरिष्ठ रेल अधिकारी ने माना कि ऐसी कोशिश हो रही है। इसे क्षेत्रीय भाषाओं को प्रोत्साहन देने के नाम पर किया जा रहा है।

इस अधिकारी ने बताया कि अभी यह समझदारी बनी है कि जिन राज्यों में हिन्दी बोली जाती है, वहाँ तो हिन्दी में परीक्षा होगी, लेकिन उन राज्यों के बाहर सिर्फ अँगरेजी या क्षेत्रीय भाषा में ही परीक्षाएँ हों। इसकी सुगबुगाहट तभी शुरू हुई थी, जब रेलमंत्री ने क्षेत्रीय जोनों की भर्ती में वहाँ के निवासियों के लिए विशेष प्रावधान की घोषणा की थी।

सवाल है कि जो हिन्दी हमारी राष्ट्रीय भाषा है, उसकी क्या इस तरह उपेक्षा की जा सकती है?