भारत की तलाश

 
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Tuesday, September 1, 2009

बिना जरूरत ही खरीद डालीं 130 करोड़ की दवाएं!!

राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में करोड़ों रुपये का घोटाला करने के आरोप में फंसे झारखंड के पूर्व स्वास्थ्य सचिव प्रदीप कुमार सहित कई आरोपियों के ठिकानों पर 31 अगस्त को सीबीआई ने छापा मारा। सीबीआई के अनुसार कुमार ने दवा आपूर्ति करने वाले नौ लोगों के साथ मिल कर मिशन के लिए ऐसी दवाइयां खरीदीं जिनकी जरूरत ही नहीं थी। इन दवाओं की खरीद के लिए सारे नियम-कायदों की भी धज्जियां उड़ा दी गई। 1991 बैच के आईएएस कुमार गत जून तक तक झारखंड में स्वास्थ्य सचिव थे। वह फिलहाल संस्थागत वित्त सचिव के पद पर हैं।


सीबीआई के अनुसार कुमार के साथ मिल कर इन लोगों ने एक साजिश के तहत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के लिए ऐसी दवाइयां खरीदीं जिनकी जरूरत ही नहीं थी। ये दवाइयां 2008 के दौरान प्रदीप के स्वास्थ्य सचिव रहते हुए खरीदी गई थीं। 130 करोड़ रुपये से ज्यादा की ये दवाइयां भंडार गृह में रखे-रखे खराब हो गई। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के लिए खरीदे गए महंगे उपकरणों का भी उपयोग नहीं किया जा सका।

Friday, March 13, 2009

अस्पताल में मरीजों को पका हुया चूहा खिला दिया गया!

भले ही डॉक्टर मरीजों को शुद्ध और पौष्टिक भोजन लेने और साफ सफाई की सलाह देते हों लेकिन 12 मार्च को झारखंड के पाटलिपुत्र मेडिकल कालेज अस्पताल की ओर से,  शिशु वार्ड के मरीजों को चावल के साथ दो पके चूहे भी भोजन में परोस दिए गए। चूहा मिला भोजन करने वाले बच्चे और महिलाएं उल्टियां करने लगीं। आनन-फानन में प्रबंधन ने किचन के दो कर्मचारियों को हटा दिया और मामले की जांच के लिए कमेटी गठित कर दी है।

12 मार्च की दोपहर लगभग 12 बजे कचहरी रोड में स्थित पीएमसीएच के मरीजों के बीच अस्पताल प्रबंधन की ओर से तैयार भोजन बांटा गया। ग्राउंड फ्लोर से लेकर पहली मंजिल के सभी वार्डो के अधिकतर मरीजों ने इस भोजन को खा लिया। यही भोजन पहली मंजिल पर स्थित शिशु वार्ड में भर्ती मरीजों को दिया गया। दैनिक जागरण के अनुसार, यहां भर्ती अंकुश कुमार और प्रतिमा ने भोजन करना शुरू किया तो उनके खाने में चूहों के दो मरे हुए बच्चे मिले। इसके बाद तो पूरे वार्ड में अफरा-तफरी मच गई। जब तक मामला खुला तब तक बच्चों को दिए गए इस भोजन को बच्चों के साथ उनके कई अभिभावक भी खा चुके थे।

मामला खुलते ही सभी उल्टियां करने लगे। पूरे अस्पताल में हड़कंप मच गया। तत्काल मामले की जानकारी अस्पताल अधीक्षक डा. पीके सेंगर को दी गई। उन्होंने मामले की जांच के लिए कमेटी गठित कर दी है। किचन में काम करने वाले अस्पताल के दो कर्मियों को हटा दिया गया है। अस्पताल अधीक्षक डा. पीके सेंगर ने स्वीकार किया कि घटना लापरवाही के कारण हुई है। चावल को पकाने के पहले साफ नहीं किया गया जिसके कारण ऐसी गड़बड़ी हुई। चिकित्सकों के अनुसार यदि भोजन के साथ चूहों को पका दिया जाए तो उसके घातक परिणाम भी हो सकते हैं। यदि चूहे वायरस और बैक्टीरिया से संक्रमित हुए तो भोजन करने वालों को रैट बाइट फीवर और लैप्टो स्पराइसिस बीमारी होने का खतरा रहता है।

Sunday, June 22, 2008

रिटायर्ड इंजीनियर ने पाले हैं 35,000 कोबरा

झारखंड में सरायकेला-खरसावन जिले के कचाई में सांपों का एक फार्म लोगों के लिए कौतूहल का सबब है। इस इको-फ्रेंडली फार्म को चलाते हैं- 78 वर्षीय एन. के. सिंह, जो मूल रूप से बिहार के भागलपुर जिले के रहने वाले हैं व Tata Iron and Steel Company (टिस्को) से रिटायर हुए इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हैं। इंजीनियर सिंह अपने गले में दर्जन भर मोबाइल फोन लटकाए रहते हैं। जहां एक आम व्यक्ति अपने मोटरसाइकिल की डिग्गी में कागजात, सब्जियां या अन्य सामान रखते हैं, सिंह अपने दो-पहिया वाहन के बक्से में कोबरा रखना पसंद करते हैं। उनका कहना है कि जब भी मैं कोई सांप देखता हूं तो उत्साह से भर उठता हूं। उसे पकड़ने में मुझे अद्भुत खुशी और संतोष हासिल होता है। उन्होंने जो 12 मोबाइल फोन कनेक्शन ले रखे हैं उस पर अलग-अलग इलाकों में रहने वाले लोगों के कॉल आते रहते हैं जो अपने घर या आसपास सांप देखकर सिंह को तुरंत इसकी सूचना देते हैं।

सिंह सांप पकड़ने के लिए महज 2 छड़ियों का इस्तेमाल करते हैं। कोबरा को पकड़ने के बाद वह इसे अपने फार्म ले जाते हैं जहां उन्होंने पहले से ही 35,000 विषधर पाल रखे हैं। हालांकि सिंह यह काम धर्मार्थ नहीं करते, बल्कि इसकी पूरी कीमत वसूलते हैं। वह इन सांपों का जहर वेलौर स्थित Christian Medical College (सीएमसी) को बेचते हैं जिसके लिए उन्हें 11 लाख रुपये प्रति औंस (लगभग 30 ग्राम) की मोटी रकम मिलती है। 800 कोबरा मिल कर 30 मिलीलीटर जहर पैदा कर सकते हैं। सिंह ने जो 35,000 कोबरा पाल रखे हैं वे हर साल 30 से 32 औंस (लगभग 1 किलोग्राम ) जहर पैदा करते हैं। तो इस हिसाब से उनकी कमाई का अंदाजा आप लगा सकते हैं। वह यह काम कानूनी तौर पर कर रहे हैं। उनके पास जंगली सांपों को पकड़ने के लिए बाकायदा लाइसेंस भी है जो वन विभाग ने जारी किया है।

सिंह का दावा है कि वह कभी भी किसी के निजी मकान या प्रतिष्ठान में घुस कर सांप नहीं पकड़ते, जब तक कि वह किसी के घर में न घुस जाए। उन्होंने दावा किया है कि हाल ही में क्लोरीन गैस के रिसाव के बाद टेल्को की रेजिडेंशल कॉलोनी में 145 कोबरा पाए गए हैं। लेकिन कंपनी के अधिकारियों ने सिंह के दावे को गलत बताते हुए कहा है कि यह उनका अपने फार्म के लिए सांप पकड़ने का हथकंडा है। जो भी हो 35,000 कोबरा पालना मजाक नहीं है। सिंह ने इन सांपों की देखभाल के लिए 45 लड़कों को काम पर रखा है जिनमें से ज्यादातर उड़ीसा के रहने वाले हैं और इस काम में माहिर हैं। अगर सिंह की बात पर यकीन किया जाए तो वह इन कोबरा के खाने पर हर साल 2.5 लाख रुपये खर्च करते हैं। उनके फार्म में सिंगापुर, ब्राजील और साउथ अफ्रीका से लाए गए गोल्डन कोबरा भी हैं। दिलचस्प यह है कि सिंह को इस नायाब काम के लिए अपने परिवार का समर्थन हासिल नहीं है।

Tuesday, April 15, 2008

झारखंड में चपरासी का बेटा कलेक्टर बना

जमशेदपुर में आयकर विभाग में चपरासी शिवनाथ उरांव के बेटे विष्णुदेव कच्छप ने, कड़ी मेहनत और बुलंद हौसले के चलते वह करिश्मा कर दिखाया है, जिसकी कल्पना कभी परिवारवालों ने नहीं की थी। बड़ी से बड़ी मुश्किल भी विष्णु की राह नहीं रोक पायी। विष्णु जेपीएससी सिविल सेवा परीक्षा में राज्य में तीसरे स्थान पर रहे हैं।

आउट हाउस में रहने वाले विष्णु की प्रारंभिक शिक्षा जयनगरा (पलामू) से हुई। बेहद संघर्ष करते हुए उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त की। कॉलेज की पढ़ाई के लिए न केवल उन्होंने ट्यूशन किया बल्कि तीन साल तक होटल में काम किया। बावजूद कभी भी अपने अंदर के हौसले और जज्बे को मरने नहीं दिया। सात भाई-बहनों में सबसे बड़े विष्णु ने घर की माली हालत को देख नेटवर्किंग बिजनेस में हाथ आजमाया। वे कहते हैं-मेरा पिछला आठ साल बेहद संघर्षमय रहा। शादी हो गयी, बच्चे हो गये और पारिवारिक दायित्व बढ़ता गया।

ऐसे में सिविल सेवा की तैयारी के बार में सोच पाना भी मुश्किल था। लेकिन नेटवर्किंग के बिजनेस ने प्रेरित किया फिर क्या था मैंने ठान ली कि सिविल सेवा परीक्षा में बैठना है। काम करते हुए भी मैंने कठिन परिश्रम किया। रात-रात भर बैठकर पढ़ाई की। घर के लोगों को कई बार गुस्सा भी आता, लेकिन मैं धैर्यपूर्वक आगे बढ़ता गया और आज उसका परिणाम सामने है।

विष्णु का कहना है "मेरी अनपढ़ मां को लगता नहीं था कि मैं कभी बड़ा आदमी बन सकता हूं।" वे यह भी कहते हैं कि हम अपने भविष्य को नहीं बनाते, हम अपनी आदतें बनाते हैं, और हमारी आदतें हमारा भविष्य बनाती हैं।