भारत की तलाश
Monday, March 2, 2009
कुंवारों में नसबंदी कराने का चलन शुरू
Tuesday, February 10, 2009
पूरे परिवार को चलती ट्रेन से फेंका
मुरारी अपनी पत्नी व बच्चों के साथ होडल के पास 9-10 फरवरी की रात मुरैना जा रहे थे। रात लगभग 10:15 बजे निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 7 से उन्होंने एक ट्रेन पकड़ी। ट्रेन में तीन-चार युवकों ने उन्हें नशीला तंबाकू खिला दिया। इसके बाद उनका सिर चकराने लगा। इस बीच युवकों ने उनकी पत्नी के साथ छेड़खानी शुरू कर दी। इसके चलते उन्होंने बोगी बदल दी, लेकिन युवक उनके पीछे वहां भी आ गए। उन्होंने जब विरोध किया तो युवकों ने होडल के पास उन्हें, उनके एक साल के बेटे अमन और चार साल की बेटी शिवानी सहित चलती ट्रेन से फ़ेंक दिया। गनीमत रही कि टेन की स्पीड कम थी, जिसकी वजह से चारों की जान बच गई।
रात को पास की एक बस्ती में रात गुजारने के बाद मंगलवार सुबह इस परिवार ने पलवल के सरकारी हॉस्पिटल में मरहम पट्टी कराई। इसके बाद उन्हें फरीदाबाद के बीके हॉस्पिटल में दाखिल कराया गया है। डॉक्टरों का कहना है कि एक साल के बच्चे अमन के सिर पर गहरी चोट है। उसे अंडर आब्जवेर्शन रखा गया है। जीआरपी के इंचार्ज प्रह्लाद के अनुसार मामले की जांच की जा रही है। यह पूछे जाने पर कि किस ट्रेन से आए थे, मुरारी का कहना है कि टिकट सूटकेस में थे जो ट्रेन में ही रह गया। रेलवे पुलिस पता लगा रही है कि घटना किस ट्रेन में हुई।
ऐसी ही एक घटना अहमदाबाद में भी हुई। पीटीआई के मुताबिक भरूच रेलवे स्टेशन के पास दो युवकों को चलती ट्रेन से फेंक दिया गया, जिससे एक की मौत हो गई और दूसरा गंभीर रूप से घायल हो गया। रेलवे सुरक्षा बल के अफसरों ने बताया कि महाराष्ट्र के जलगांव तालुका के रहने वाले शंकर कोली (24) को ओखा पुरी एक्सप्रेस की जनरल बोगी में सीटों को लेकर हुई बहस के बाद चलती ट्रेन से बाहर फेंक दिया गया। उन्होंने बताया कि शंकर की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि दूसरे युवक को गंभीर चोट आई है। घायल को अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
Wednesday, August 13, 2008
तिरंगे की बदौलत चल रहा है घर का चूल्हा!
उत्तरप्रदेश के वाराणसी के साड़ी उद्योग में आई मंदी के कारण, लल्लापुरा निवासी मुहम्मद वसी का परिवार बेरोजगारी की मार झेल रहा था, लेकिन अब वे तिरंगा बुन रहे हैं, जिससे उसकी बेरोजगारी तो दूर हुई ही, साथ ही इनकी अलग पहचान भी बनी है। देशभक्ति के साथ रोजगार को जोड़ने वाले अकेले केवल वसी का ही परिवार नहीं है बल्कि वाराणसी में ऐसे लगभग दस परिवार हैं, जिनके घर का चूल्हा इसी तिरंगे की बदौलत चल रहा है। रेशम पर बनने वाला यह तिरंगा अब सभी वर्ग के लोगों के लिए बनने लगा है। कागज के तिरंगे की जगह अब यह तिरंगा दुपट्टे के रूप में तैयार किए जा रहे हैं।
मीडिया में आयी जानकारी के अनुसार मुहम्मद वसी अपने हैंडलूम पर केवल भारत में बने रेशम से ही तिरंगा झंडे बुनते हैं, क्योंकि वसी महसूस करते हैं कि तिरंगा तैयार करना उनके रोजगार का जरिया जरूर है, लेकिन यह भारत की शान का भी प्रतीक है। अत: इसमें इस्तेमाल होने वाली कोई भी चीज विदेशी नहीं होनी चाहिए। हैंडलूम पर तिरंगा बनाने के पीछे वसी की बेरोजगारी तो है साथ ही उनके अंदर देशभक्ति का भाव भी था। उन्होंने कहा, ''हम लोग भारतीय तिरंगे को सम्मान पूर्वक फहराते हैं। नवीन जिंदल ने उच्चतम न्यायालय से सभी भारतीयों के लिए यह अधिकार प्राप्त किया है। अब सभी स्कूलों के बच्चों के हाथों में 15 अगस्त और 26 जनवरी के दिन कागज व प्लास्टिक के तिरंगे तो दिखते हैं, लेकिन बाद में ये तिरंगे ऐसी जगह पड़े रहते हैं जहां उसका उचित सम्मान नहीं हो पाता है।''
उन्होंने कहा, ''इसके बाद ही कपड़े के तिरंगे तैयार करने की बात मेरे मन में आई। बस! मैं 26 जनवरी और 15 अगस्त के लिए तिरंगा तैयार करने लगा और वह हाथों-हाथ बिकने लगा।'' 'विशाल भारत संस्थान' नामक एक स्वयंसेवी संस्था ने अपने कूड़ा चुनने वाले बच्चों को भेंट करने के लिए और मुहम्मद वसी के उत्साहवर्धन के लिए तिरंगे की मांग की है। संस्था के संस्थापक डा. राजीव श्रीवास्तव ने कहा कि रोजगार और देशभक्ति की भावना यदि साथ-साथ मिल जाए तो इससे देश में अमन और शांति का वातावरण होगा। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के मालवीय सेंटर फॉर पीस के निदेशक प्रियंकर उपाध्याय ने कहा, '' इस देश में मात्र दो ही चीजों की कमी है रोजगार और देशभक्ति, तिरंगे के निर्माण में दोनों ही चीजें दिखाई पड़ रही हैं।''
Sunday, June 15, 2008
हम किसी से कम हैं क्या !?
लगता है आजकल मध्यप्रदेश को ख़बरों के मध्य रखा जाना भा रहा है! आईपीएल के दौरान चीयर गर्ल्स का मुखर विरोध करने वाली सरकार के दो मंत्री शुक्रवार, १३ जून को बालाघाट में लगे एक सर्कस में पहुँचे, जहाँ कला के नाम पर महिलाओं का अश्लील नृत्य चल रहा था। वे यहाँ लोक कल्याण शिविर में हिस्सा लेने पहुँचे थे। इतना बता दें कि यह ख़बर और विवरण पीटीआई-भाषा द्वारा जारी की गयी है।
मंत्रीजी के अलावा पार्टी के कुछ स्थानीय जनप्रतिनिधि भी इस आयोजन में शामिल हुए थे। मौका था वन विभाग द्वारा लोक वानिकी योजना के हितग्राहियों को राशि के वितरण का। इसके बाद वन विभाग ने सर्कस के एक मुफ्त शो का आयोजन किया था। इस आयोजन में राज्य के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री चौधरी चंद्रभानसिंह और पशुपालन मंत्री रमाकांत तिवारी स्थानीय जनप्रतिनिधियों के साथ मौजूद थे। सर्कस में विभिन्न कलाबाजियों के अलावा महिलाओं का एक ऐसा भौंडा और अश्लील नृत्य का आयोजन किया गया था, जिसे आमतौर पर परिवार के साथ कोई भी बैठकर देखना पसंद न करे, लेकिन संस्कृति बचाने की वकालत करने वाले सरकार के ये दो मंत्री शायद इस आयोजन में इतने मशगूल हो गए थे कि यहाँ कला के नाम पर चल रही अश्लीलता उन्हें दिखाई नहीं दी।
बाद में संवाददाताओं द्वारा पूछे जाने पर बालाघाट के प्रभारी मंत्री चन्द्रभानसिंह ने स्वीकार किया कि उन्हें सर्कस में नहीं आना चाहिए था, लेकिन उनका कहना था कि जैसे ही अश्लील नृत्य होते देखा तो वे उठकर चले आए थे। उन्होंने माना कि परिवार और छोटे बच्चों की उपस्थिति में होने वाले आयोजन में ऐसा भौंडा प्रदर्शन सही नहीं है। दूसरी तरफ पशुपालन मंत्री रमाकांत तिवारी ने इस मामले में पूछे जाने पर कहा कि यह तो कला प्रदर्शन है। कला में प्रतिबंध लगाना सर्वथा अनुचित है और लगाया भी नहीं जा सकता है।
Monday, June 9, 2008
छात्र-छात्राएं जाते हैं हथियार लेकर स्कूल
स्कूलों में हिंसा का खौफ बाल मानस पर इस कदर हावी है कि करीब 12 फीसदी छात्र अपने साथ कभी न कभी चाकू जैसे हथियार लेकर स्कूल गए हैं। सफदरजंग अस्पताल एवं वर्धमान महावीर मेडिकल कालेज नई दिल्ली के Community Medicine के डाक्टर राहुल शर्मा के नेतृत्व में MIMS अंबाला और UCMS & GTB अस्पताल दिल्ली के अनुसंधानकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पाया है कि स्कूल जाने वाला हर दूसरा छात्र पिछले एक साल में किसी न किसी शारीरिक झगड़े में लिप्त रहा है।
अध्ययन के मुताबिक छात्र-छात्राओं से पूछा गया कि क्या वे चाकू, छड़ी, चाबुक और तलवार लेकर स्कूल गए हैं। इस पर करीब 12 फीसदी छात्र-छात्राओं ने जवाब दिया कि वे पिछले 30 दिन में कोई न कोई हथियार लेकर स्कूल गए। हथियार लेकर जाने वालों में छात्रों का 15.7 का प्रतिशत छात्राओं से 3.9 से ज्यादा था। शर्मा ने बताया कि इसकी वजह सिख समुदाय के छात्र-छात्राओं द्वारा धार्मिक वजहों के चलते कृपाण धारण करना हो सकता है, लेकिन अध्ययन में सिर्फ दो प्रतिशत ही सिख विद्यार्थी शामिल थे, इसलिए इस कारण का महत्व नजर नहीं आता।
Indian Journal of Community Medicine के ताजा अंक में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार 13 फीसदी छात्रों ने बताया कि उन्होंने पिछले 12 महीने में किसी न किसी हथियार से लोगों को घायल किया है या फिर उन्हें धमकाया है। इनमें भी अधिकांश तादाद छात्रों की है। अध्ययन में पाया गया है कि हर दूसरा लड़का पिछले एक साल में शारीरिक झगड़े में लिप्त रहा। जबकि हर पांच में से एक छात्रा भी किसी न किसी रूप से समान अवधि में शारीरिक झगड़े में शामिल थी। शर्मा ने बताया कि अध्ययन में शामिल छात्र- छात्राओं में से लगभग 18 प्रतिशत ने बताया कि उन्हें शारीरिक झगड़े में ऐसी चोट आई जिसके लिए चिकित्सा सुविधा देने की जरूरत थी।
यह अध्ययन दक्षिण दिल्ली के तीन स्कूल और दो कालेजों के 550 छात्रों पर किया गया है। इनमें 67.1 प्रतिशत छात्र और 32.9 प्रतिशत छात्राएं थी। इन छात्र-छात्राओं की उम्र 14 से 19 वर्ष के बीच है। अध्ययन में शामिल 62.4 प्रतिशत विद्यार्थियों ने अपना निवास निजी कालोनी या एक अलग बंगले में बताया। अध्ययन में शामिल तीन-चौथाई छात्र-छात्राएं एकल परिवार तथा बाकी संयुक्त परिवार के थे। बच्चों के व्यवहार के बारे में किए गए इस अध्ययन में बताया गया है कि कैसे बच्चे अपने माता-पिता, दोस्तों, भाई-बहनों, शिक्षकों या सेलिब्रिटी को धूम्रपान या मदिरापान करते देख उनसे प्रभावित हो जाते हैं।
Sunday, April 20, 2008
अब सच लगता है: करदे मुश्किल जीना, इश्क कमीना
इश्क, प्यार, मुहब्बत। कोई माने या ना माने, इन शब्दों का एक ही मतलब होता है, त्याग। बेशक, तरीका अलग हो सकता है। ऐसे ही एक तरीके में, एक बेटी (!?) ने अपने परिवार के साथ जो किया, उसे देख व सुन शायद, इंसान यही कहने को विवश होगा कि भगवान ऐसी बेटी को किसी के घर जन्म ही न दे। इश्क, किसी परिवार के एक नहीं बल्कि सभी सात सदस्यों के लिए मौत का सबब बन जाएगा, इसकी कल्पना शायद ही कोई करे। ज्योतिबा फूले नगर [अमरोहा] में एक दुर्भाग्यपूर्ण परिवार की लड़की, परिजनों के लाख मना करने के बावजूद वह अपने प्रेमी से प्यार की पींगे बढ़ाती रही और आखिर में अपना प्यार परवान न चढ़ते देख प्रेमी के साथ मिलकर अपने ही परिजनों के लिए यमराज बन बैठी। हैवान बनकर केवल अपने प्रेमी को पाने की खातिर माता-पिता व छोटे भाई-बहनों की जिंदगी अपने ही हाथों से छीन ली। इस बेहद वीभत्स व दर्दनाक वाकये को अंजाम देने से पहले उस लड़की का दिल अपने माता-पिता व छोटे भाई-बहनों की जिंदगी के लिए तनिक भी नहीं पसीजा और अपने परिवार का समूल ही मिटा दिया। ऐसा करके उसने खून के रिश्ते, इंसानियत, मानवता आदि का ही गला नहीं घोटा बल्कि मानवीय समाज की सभी वर्जनाओं को भी तार-तार करके रख दिया।
एक ही परिवार के सात सदस्यों की हत्या के मामले में पुलिस ने शबनम और सलीम को गिरफ्तार कर इस हत्याकांड का सनसनीखेज खुलासा किया। इस हत्याकांड में 24 वर्षीय शबनम ही एक मात्र जीवित बची थी क्योंकि वह छत पर सो रही थी। यह हत्याकांड हसनपुर थाना क्षेत्र के बावनखेड़ी गांव में हुआ था। जल्दी ही पुलिस को शबनम पर शक होने लगा और इसका आधार था घर का मजबूत लोहे का दरवाजा, जिसे तोड़कर अंदर आना संभव नहीं था। पुलिस यही मानकर चली कि दरवाजे को अंदर से ही खोला गया है। मारे गए सभी लोगों के शवों से भी पता चलता था कि ये सभी मूर्छित अवस्था में थे और प्रतिरोध किए जाने के कोई लक्षण नहीं मिले। शबनम के मोबाइल का विवरण प्राप्त करने के बाद पुलिस के हाथ महत्वपूर्ण सूत्र लगे। तीन महीने में 900 से ज्यादा बार उसकी बात उसी गांव में आरा मशीन चलाने वाले सलीम पुत्र अब्दुल रऊफ से हुई थी। दोनों के बीच गहरा इश्क था।
पुलिस महानिदेशक के अनुसार शबनम का परिवार हर दृष्टि से सलीम के परिवार से संपन्न था और शबनम स्वयं शिक्षा मित्र के रूप में कार्यरत थी। पारिवारिक रुतबे में बराबरी न होने के कारण शबनम के घरवालों ने दोनों की शादी से इनकार कर दिया था। शादी न करने देने से नाराज प्रेमी ने प्रेमिका के घरवालों को ही साफ करने का इरादा किया और इसमें उसका साथ प्रेमिका ने बखूबी निभाया। शबनम ने परिवार के सभी सदस्यो को नशीली दवा खाने में मिलाकर दे दी और जब वे बेहोश हो गए तो पूर्व निर्धारित योजनानुसार सलीम को फोन से बुलवा लिया।
उन्होंने बताया कि दोनो ने टार्च की रोशनी में परिवार के छह सदस्यों के गले काट दिए, जबकि एक बच्चे को गला घोटकर मार दिया। उन्होंने बताया कि तलाशी मे शबनम के घर से उसका रक्त रंजित सलवार कुर्ता और बायापोज की गोलियों का रैपर भी बरामद कर लिया गया है। पुलिस महानिदेशक ने कहा कि सलीम और शबनम ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है।