भारत की तलाश

 
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Tuesday, May 6, 2008

सरकार के फैसले को लागू करवाने को अर्जी दी, समय से पहले तबादला मिला

अभी अभी तो ख़बर आयी थी अनाथालय की जमीन पर अस्सी अरब में बन रहे आशियाने की। अब खबर आयी है कि इस आशियाने के मालिक, रिलायंस इंडस्ट्रीज के प्रमुख मुकेश अंबानी, के कब्जे वाली इस जमीन की बहाली के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक विशेष याचिका दाखिल करने वाले महाराष्ट्र राज्य वक्फ बोर्ड के सीईओ एआर शेख का तबादला ग्रामीण विकास विभाग में कर दिया गया है।

दैनिक भास्कर में समाचार है कि सुप्रीम कोर्ट में विशेष याचिका की सुनवाई के एक दिन बाद ही शेख का तबादला कर दिया गया। शेख ने फोन पर कहा कि 3 मई को उन्हें स्थानांतरण आदेश मिले हैं और वे जल्द ही वे अपने अभिभावक विभाग में हाजिरी देंगे। हालांकि उन्होंने इन खबरों पर प्रतिक्रिया नहीं दी जिनमें कहा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने की वजह से उनका तबादला किया गया है।

मामला यह है कि अंबानी की कंपनी एंटीलिया कमर्शियल प्राइवेट लि. ने अल्टामाउंट रोड पर 4532 वर्गमीटर का यह प्लॉट छह साल पहले एक अनाथालय से सार्वजनिक नीलामी के दौरान 21 करोड़ रुपए से ज्यादा में खरीदा था। इस सौदे को अवैध करार देते हुए सरकार ने पिछले साल जुलाई में बोर्ड से प्लॉट का कब्जा लेने को कहा था।

इसके बाद शेख ने एंटीलिया को वक्फ एक्ट के सेक्शन 52 के तहत नोटिस जारी कर वक्फ संपत्ति बोर्ड को सौंपने को कहा था। शेख ने इस प्लॉट को एंटीलिया के नाम किए जाने का भी विरोध किया था। अब शेख से जुड़े सूत्रों का कहना है कि उनका तबादला इसलिए किया गया है क्योंकि उन्होंने गड़बड़ियों पर ऐतराज जताया और एंटीलिया को राहत देने वाले बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट की शरण ली।

राजस्व और वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि हाई कोर्ट में एक याचिका है जिसमें शेख को बतौर बोर्ड का सीईओ नियुक्त किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई है। इस याचिका का परीक्षण किए जाने के बाद शेख के तबादले का निर्णय लिया गया है। अंबानी प्लॉट डील से शेख के तबादले का कोई संबंध नहीं है।

शेख ने सीईओ की भूमिका में बोर्ड में डेप्यूटेशन पर 3 नवंबर 2006 को पदभार संभाला था। इससे पहले वे विदर्भ में वाशिम में ग्रामीण विकास विभाग में कार्यरत थे। सामान्य रूप से डेप्यूटेशन तीन साल के लिए होता है लेकिन शेख के मामले में डेढ़ साल में ही तबादला किया गया है।

Monday, March 31, 2008

७२ घंटे: ३६ कर्मचारी

सिर्फ 72 घंटे के लिए गए एक अधिकारी ने 18 लोगों को नौकरी दे दी और 18 लोगों का निलम्बन समाप्त कर दिया। अपने इस निर्णय को यह अफसर यह कहकर सही ठहरा रहे हैं कि उन्होंने जो कुछ किया न्याय संगत किया। इसमें गलत कुछ भी नहीं है। लेकिन अभ्यर्थियों का आरोप है कि उनके साथ न्याय नहीं हुआ है। नियुक्तियां इतनी हड़बड़ी में की गईं कि जाति और शिक्षा प्रमाण पत्रों का सत्यापन तक नहीं हो सका। अब कुछ अभ्यर्थी इधर-उधर भाग रहे हैं और उनकी सुनवाई भी नहीं हो रही है।

हिन्दुस्तान टाइम्स की एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में बताया गया है कि उत्तरप्रदेश महिला कल्याण, बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग में निदेशक पद पर बीते चार मार्च को आवास विभाग के विशेष सचिव राम बहादुर का तबादला किया गया। उन्होंने पांच मार्च से काम शुरू किया। छह मार्च को शिवरात्रि की छुट्टी पड़ गई और सात मार्च को उनका तबादला लखनऊ विकास प्राधिकरण में उपाध्यक्ष पद पर हो गया। लेकिन रामबहादुर इन दोनों पदों पर एक साथ 13 मार्च तक काम करते रहे। ऐसी परम्परा है कि तबादला होने के बाद अधिकारी बड़े निर्णय नहीं लेते। लेकिन इस विभाग में नए अफसर के आने का इंतजार नहीं किया गया।

विभाग में विभिन्न पदों पर बैकलॉग की भर्ती की प्रक्रिया चल रही थी। कार्मिक नियमावली के मुताबिक प्रमाणपत्रों के बिना सत्यापन कराए नियुक्ति नहीं की जा सकती। लेकिन न तो अभ्यर्थियों की जाति प्रमाणपत्रों की जांच पड़ताल कराई गई और न ही उनके शैक्षिक प्रमाण पत्रों का सत्यापन कराया गया। प्रमाणपत्रों की जांच के निर्णय को नजरंदाज करते हुए विभिन्न पदों पर 18 कर्मचारियों की नियुक्ति के आदेश जारी कर दिए गए। इसी दौरान 18 निलम्बित कर्मचारियों को बहाल करने के आदेश भी जारी किए गए। इनमें किसी पर पुष्टाहार बेचने का आरोप था तो किसी को रिश्वत लेते पकड़ा गया था। कुछ को जिलाधिकारी स्तर पर निलम्बित किया गया था।

इन कर्मचारियों को विभाग ने आरोप पत्र जारी किया और पर्याप्त उत्तर न मिल पाने के कारण मामले विचाराधीन थे। लेकिन रामबहादुर ने निलम्बित कर्मचारियों को बहाल कर दिया। दलील थी कि किसी भी कर्मचारी को लम्बे समय तक निलम्बित नहीं रखा जा सकता, या तो कर्मचारी को बहाल किया जाए अथवा उसे सेवा मुक्त किया जाए।