भारत की तलाश

 

Saturday, August 16, 2008

नास्डेक में भी मना जश्न, आजादी का

दुनिया का सबसे बड़ा स्टॉक एक्सचेंज, नास्डेक भी भारत के स्वतंत्रता दिवस के जश्न का गवाह बना। आजादी की 62 वीं सालगिरह के अवसर को खास बनाने के लिए इस दिन यहां भारतीय ध्वज तिरंगा फहरा रहा था। साथ ही एक्सचेंज में कारोबार की समापन घंटी बजाने के लिए भारतीय महावाणिज्य दूत नीलमदेव विशेष तौर पर आमंत्रित थीं। यह पहला मौका है जब महावाणिज्य दूत ने इस स्टाक मार्केट में बंदी की घंटी बजाई।

एक्सचेंज के बाहर ऐतिहासिक टाइम स्क्वायर की तरफ लगा विशाल इलेक्ट्रानिक बोर्ड भी केसरिया, सफेद और हरे रंग से जगमगा रहा था। इसमें लिखा था भारत का स्वतंत्रता दिवस।

नास्डेक में 3200 से अधिक कंपनियां सूचीबद्ध हैं। यहां छह भारतीय कंपनियां भी लिस्टेड हैं जिनका सम्मिलित बाजार पूंजीकरण करीब 35 अरब डालर है। इनमें एक्स वन सर्विस, रेडिफ डाट काम, सिफी टेक्नोलाजीज, सिंटेल इंक, काग्नीजेंट टेक्नोलॉजी और इन्फोसिस शामिल हैं।

भारतीय महिला बनीं सहायक उपकुलपति

आंध्रप्रदेश में जन्मी डॉ. शिवा कुमारी को अमेरिका के टेक्सास स्थित राइस विश्वविघालय का सहायक उपकुलपति नियुक्त किया गया है। विश्वविघालय के कुलपति (प्रोवोस्ट) इयुगेन लेवी ने डॉ. शिवा की नियुक्ति की घोषणा की। गौरतलब है कि राइस विश्वविघालय में फिलहाल शिक्षाशास्त्र के प्रशिक्षण का कोई संस्थान नहीं है और प्राइमरी एवं सेकंडरी स्तर के शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए आने वाले लोगों को अन्य संस्थाओं की मदद से प्रशिक्षित किया जाता है।

Wednesday, August 13, 2008

तिरंगे की बदौलत चल रहा है घर का चूल्हा!

उत्तरप्रदेश के वाराणसी के साड़ी उद्योग में आई मंदी के कारण, लल्लापुरा निवासी मुहम्मद वसी का परिवार बेरोजगारी की मार झेल रहा था, लेकिन अब वे तिरंगा बुन रहे हैं, जिससे उसकी बेरोजगारी तो दूर हुई ही, साथ ही इनकी अलग पहचान भी बनी है। देशभक्ति के साथ रोजगार को जोड़ने वाले अकेले केवल वसी का ही परिवार नहीं है बल्कि वाराणसी में ऐसे लगभग दस परिवार हैं, जिनके घर का चूल्हा इसी तिरंगे की बदौलत चल रहा है। रेशम पर बनने वाला यह तिरंगा अब सभी वर्ग के लोगों के लिए बनने लगा है। कागज के तिरंगे की जगह अब यह तिरंगा दुपट्टे के रूप में तैयार किए जा रहे हैं।

मीडिया में आयी जानकारी के अनुसार मुहम्मद वसी अपने हैंडलूम पर केवल भारत में बने रेशम से ही तिरंगा झंडे बुनते हैं, क्योंकि वसी महसूस करते हैं कि तिरंगा तैयार करना उनके रोजगार का जरिया जरूर है, लेकिन यह भारत की शान का भी प्रतीक है। अत: इसमें इस्तेमाल होने वाली कोई भी चीज विदेशी नहीं होनी चाहिए। हैंडलूम पर तिरंगा बनाने के पीछे वसी की बेरोजगारी तो है साथ ही उनके अंदर देशभक्ति का भाव भी था। उन्होंने कहा, ''हम लोग भारतीय तिरंगे को सम्मान पूर्वक फहराते हैं। नवीन जिंदल ने उच्चतम न्यायालय से सभी भारतीयों के लिए यह अधिकार प्राप्त किया है। अब सभी स्कूलों के बच्चों के हाथों में 15 अगस्त और 26 जनवरी के दिन कागज व प्लास्टिक के तिरंगे तो दिखते हैं, लेकिन बाद में ये तिरंगे ऐसी जगह पड़े रहते हैं जहां उसका उचित सम्मान नहीं हो पाता है।''

उन्होंने कहा, ''इसके बाद ही कपड़े के तिरंगे तैयार करने की बात मेरे मन में आई। बस! मैं 26 जनवरी और 15 अगस्त के लिए तिरंगा तैयार करने लगा और वह हाथों-हाथ बिकने लगा।'' 'विशाल भारत संस्थान' नामक एक स्वयंसेवी संस्था ने अपने कूड़ा चुनने वाले बच्चों को भेंट करने के लिए और मुहम्मद वसी के उत्साहवर्धन के लिए तिरंगे की मांग की है। संस्था के संस्थापक डा. राजीव श्रीवास्तव ने कहा कि रोजगार और देशभक्ति की भावना यदि साथ-साथ मिल जाए तो इससे देश में अमन और शांति का वातावरण होगा। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के मालवीय सेंटर फॉर पीस के निदेशक प्रियंकर उपाध्याय ने कहा, '' इस देश में मात्र दो ही चीजों की कमी है रोजगार और देशभक्ति, तिरंगे के निर्माण में दोनों ही चीजें दिखाई पड़ रही हैं।''

बीजिंग में हुआ खेल के महानायक का अपमान!

बीजिंग ओलंपिक में गोल्ड जीतनेवाले अभिनव बिंद्रा पर जहां पूरा देश नाज कर रहा है, वहीं भारतीय ओलंपिक संघ (आईओए) के अधिकारियों ने कथित तौर पर बिंद्रा का अपमान किया। देशवासियों की पलकों पर बैठे अभिनव बिंद्रा का यह अपमान तब हुआ, जब लोग इस बडी ज़ीत के जश्न की खुमारी से भी उबर नहीं पाए थे।

एक निजी समाचार चैनल के मुताबिक अभिनव आज रायवर्धन राठौड़ का डबल ट्रैप इवेंट देखने गए थे। इंवेट देखने के बाद स्टेडियम से बाहर आए बिंद्रा आधे घंटे तक गाड़ी का इंतजार करते रहे, लेकिन किसी अधिकारी की उन पर नजर इनायत नहीं हुई। जब उन्हें गाड़ी नहीं मिली, तो वह खुद ही एक टैक्सी में बैठकर अपने होटल लौट आए। हालांकि वहां मौजूद आईओए के अधिकारियों के लिए कारें आई थीं। किसी ने भी बिंद्रा की ओर ध्यान नहीं दिया और न ही किसी ने उनसे पूछा कि वे कहां जाना चाहते हैं।

अभिनव पहले भारतीय है, जिन्होंने व्यक्तिगत स्पर्धा में सोमवार को ही बीजिंग में 10 मीटर राइफल शूटिंग में गोल्ड मेडल जीता था।

Friday, August 8, 2008

शहीदों की चितायों पर लगेंगे मेले और उनके पोते रिक्शा खींचेंगे

पश्चिम चंपारण में बेतिया नगर के बड़ा रमना मैदान में गणेश राव ने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 24 अगस्त 1942 को अपने सीने पर फिरंगियों की गोली खायी और अपने सात साथियों के साथ शहीद हो गए। आज उनके पोते उसी शहर में रिक्शा खींच और राजमिस्त्री का काम कर अपना जीवन-यापन कर रहे हैं। पुरानी गुदरी मोहल्ले के छोटे से खपरैल मकान में पूरे परिवार की जिंदगी की गाड़ी जिस हाल में चल रही है, उसे देखकर किसी का भी हृदय द्रवित हो उठेगा।

सरकारी आश्वासन के सहारे शहीद की विधवा, बेटे और बहू गुजर गए। अभी परिवार में उनके तीन पोते शंभु राव, प्यारे लाल राव व ओम प्रकाश राव हैं। प्यारे लाल रिक्शा चलाते हैं तो ओमप्रकाश व शंभु राज मिस्त्री का काम कर रहे हैं। जब इस संवाददाता ने उनसे उनके दादा की शहादत के किस्से सुनाने की गुजारिश की तो उनके मुंह से कुछ निकलता, इसके पहले ही उनकी आंखें बरसने लगीं। प्यारेलाल कह रहे थे, '1970 में तत्कालीन मुख्यमंत्री दारोगा प्रसाद राय ने बेतिया में शहीद स्मारक का शिलान्यास किया तथा शहीदों के आश्रितों को सम्मान पत्र दिया। उस दिन उन्होंने पक्का मकान और जमीन देने का भरोसा दिया। तब से लेकर आज तक कई सीएम और डीएम आए, पर उनसे मिलने के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकला। प्रधानमंत्रियों में एचडी देवगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी और अब मनमोहन सिंह तक पत्राचार कर थक चुका हूं। अब तमन्ना है, एक बार राष्ट्रपति से मिल लूं। मगर, आर्थिक विपन्नता के कारण दिल्ली दूर लगती है। क्या करूं, समझ नहीं पा रहा हूं।'

जागरण में विजय सिंग की रिपोर्ट कहती है कि संपत्ति के नाम पर इस परिवार के पास महज आठ धूर जमीन और जीर्ण-शीर्ण खपरैल मकान है। इसी मकान में भेड़-बकरियों की तरह रहने की मजबूरी है। सरकार की बात तो दूर, किसी जन प्रतिनिधि तक ने इनकी सुधि नहीं ली। प्रेरणा की बात यह है कि सरकारी सहायता की आस में पथरा चुकीं इस परिवार की आंखों में आज भी देशभक्ति का जज्बा देखा जा सकता है।

Tuesday, August 5, 2008

शादी करने पर सिर कलम किया

प्रेस ट्रस्ट द्वारा जारी एक ख़बर में बताया गया है कि एक हिंदू लड़के का सिर इसलिए कलम कर दिया गया कि उसने मुस्लिम लड़की से शादी की थी। घटना पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले की है। गांव की पंचायत (कंगारू कोर्ट) ने हालांकि उसे 'फांसी' की सजा सुनाई थी। इस सिलसिले में 3 लोगों को गिरफ्तार किया गया है।

पुलिस के मुताबिक, लखनपुर गांव की मुनेरा बीवी जब मुंबई में काम कर रही थी तो उसी दौरान बिहार निवासी शैलेंद्र प्रसाद से उसे प्यार हो गया। ढाई साल पहले दोनों ने शादी कर ली। उनके 10 महीने का एक बच्चा भी है। सब कुछ ठीक ठाक चल रहा था, लेकिन जब वे एक जुलाई को लखनपुर आए तो लड़की के मां-बाप को शैलेंद्र पर शक हुआ। जब यह पता चला कि वह हिंदू है तो पंचायत ने उसे फांसी की सजा सुनाई। लेकिन, सिर कलम किया हुआ शैलेंद्र का शव 17 जुलाई को खेत में पड़ा मिला।

Monday, August 4, 2008

जेल में बंद सांसद शहाबुद्दीन, आईएसआई और कश्मीरी आतंकवादियों के लगातार संपर्क में

37 मोबाइल, 10 अतिरिक्त मोबाइल सिम, 19 मोबाइल बैट्री चार्जर,सात अतिरिक्त मोबाइल बैट्री, एक अवैध पंखा, आठ धारदार हथियार, चाबुक, 15 टेलीफोन डायरी, अन्य अभिलेख, एक हेडफोन एवं सात विदेशी परफ्यूम की बोतलों के अतिरिक्त गुटखा के पैकेट! यह सब बरामद हुया जिलाधिकारी वंदना प्रियदर्शी व पुलिस अधीक्षक उमेश कुमार के नेतृत्व में रविवार को पूर्वाह्न साढ़े चार बजे, बिहार के सिवान जिला जेल में की गयी छापेमारी में। डीएम ने बताया कि छापेमारी में सांसद शहाबुद्दीन के पास से ही सात मोबाइल फोन के अतिरिक्त सात मोबाइल चार्जर बरामद किए गए। जब शहाबुद्दीन की जेल बैरक पर छापा मारा गया तो उसने जेल कर्मचारियों की मदद से ही अपने मोबाईल और सिम कार्ड छिपाने की कोशिश की मगर इन कोशिशों में वह कामयाब नहीं हो सका।

साढ़े चार घंटे तक चली कार्रवाई में जेल के सभी 27 वार्डो से दर्जनों मोबाइल फोन अतिरिक्त सिम कार्ड, टेलीफोन डायरी और उनमें दर्ज सैकड़ों लोगों के नम्बर तथा विदेशी परफ्यूम के अलावा कई अन्य आपत्तिजनक सामान बरामद हुए। रईस खां के कमरे से दो, जितेन्द्र स्वामी के पास से चार मोबाइल व आठ अतिरिक्त सिम बरामद किये गये। उन्होंने कहा कि बरामद आपत्तिजनक सामानों के बारे में जेल मैनुअल के तहत कानूनी कार्रवाई का आदेश दे दिया गया है। जेल में छापामारी के कार्यक्रम पूरी तरह गुप्त रखा गया था जिससे जेल में इस दल के पहुंचते ही कैदियों में हड़कंप मच गया। सीवान की जिला कलेक्टर वंदना प्रियदर्शी के अनुसार, शहाबुद्दीन ने पुलिस अधिकारियों को अपनी बैरक में घुसने से रोका और कमाल की बात यह है कि बैरक के तालों की चाभियां भी उसके पास रखी थी।

जेल बैरक से बरामद बारह सिम कार्ड और सात मोबाइल फोन जांच के लिए दिल्ली भेजे गए तो उनसे बहुत सनसनीखेज जानकारियां बाहर आई। सिम कार्डो की पड़ताल से पता लगा है कि शहाबुद्दीन जेल के भीतर से अपना माफिया संसार तो चला ही रहा था, आईएसआई और कई कश्मीरी आतंकवादियों के भी लगातार संपर्क में था। सिम कार्डो की प्रारंभिक पड़ताल पटना पुलिस की साइबर शाखा ने कर ली है और इससे मिले सारे विवरण बताते हैं कि शहाबुद्दीन लगातार आतंकवादियों के संपर्क में था।