भारत की तलाश

 

Monday, May 10, 2010

चित्तूर की भार्गवी ने एक अनोखे कंप्यूटर के विकास में सफलता हासिल की

अपने पति के डेस्कटॉप कंप्यूटर में लगे अनगिनत तारों के कारण घर को ठीक से साफ न कर पाने से परेशान आंध्रप्रदेश में चित्तूर की भार्गवी ने एक अनोखे कंप्यूटर के विकास में सफलता हासिल की है। भार्गवी ने एक ऐसे सिंगल यूनिट पर्सनल कंप्यूटर का निर्माण किया है, जिसमें सामान्य पीसी के सारे गुण मौजूद हैं। लेकिन तारों की संख्या घटकर केवल एक रह गई है।

दिलचस्प यह है कि भार्गवी कोई कंप्यूटर इंजीनियर नहीं हैं। उन्होंने केवल 12वीं तक की पढ़ाई की है, और वह भी तेलुगु माध्यम में। भार्गवी के इस कंप्यूटर को कैबटॉप (कैबिनेट टॉप) कहा जा रहा है। यानी सामान्य पीसी का ही बदला हुआ एक रूप है। इसके सारे कल-पुर्जे सामान्य पीसी के ही हैं, लेकिन इनको एक साथ एक खास तरीके के बनाए हुए अकेले कैबिनेट में फिट किया गया है।

भार्गवी ने बताया कि शुरू में उनके पति और परिवार वालों को उनके विचार पर काफी हैरानी हुई। लेकिन जब उन्हें लगा कि इस विचार में दम है तो उन्होंने भार्गवी की काफी मदद की। एक साधारण कंप्यूटर की तरह ही कैबटॉप में कोर टू डुओ का प्रोसेसर, 2 जीबी रैम और 320 जीबी हार्ड डिस्क लगा है। इसे एक टीवी के तौर पर भी प्रयोग में लाया जा सकता है और सिस्टम को चालू किए बिना ही इस पर फोटोग्राफ भी देखे जा सकते हैं।

कैबटॉप के लिए तकनीकी सपोर्ट देने वाले भार्गवी के पति रंगा रेड्डी बताते हैं कि यह पूरा सिस्टम रिमोट कंट्रोल से भी चलाया जा सकता है और इसमें एक बिल्ट इन मल्टी मीडिया सिस्टम, टीवी तकनीक, स्पीकर और ऑटोमेटिक लॉक सिस्टम भी है। कैबटॉप बिजली की भी कम खपत करता और गर्म भी कम होता है। सबसे बड़ी बात है कि यह लैपटॉप की तरह पोर्टेबल है, लेकिन इसे लैपटॉप की तरह बैग की जरूरत नहीं होती।

यह नया पीसी केंद्रीय विज्ञान और तकनीक विभाग की देखरेख में टेक्नोप्रेनियर प्रोमोशन प्रोग्राम के तहत बनाया गया है। आंध्र प्रदेश के आचार्य नागाजरुन विश्वविद्यालय ने इसके प्रोटोटाइप के निर्माण के लिए शुरुआती पैसे दिए थे। इसे पेटेंट कराने के लिए रजिस्टर्ड करा लिया गया है। सेंट्रल मेकैनिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट, दुर्गापुर में हुए परीक्षणों में इसे कारगर पाया गया है। साधारण पीसी को कैबटॉप में बदलने के लिए दो हजार से सात हजार तक का खर्च आ सकता है।
(समाचारांश दैनिक भास्कर में अनुषा रवि की रिपोर्ट से साभार)

Sunday, May 2, 2010

भारत के 115 व्यक्तियों ने एक साथ मर्सिडीज कारों की बुकिंग कराई: मर्सिडीज निर्माता हैरान

महाराष्ट्र के सीएम अशोक चौहान और पूर्व सीएम विलासराव देशमुख के इलाके वाले औरंगाबाद जिले ने नया कीर्तिमान स्थापित किया है। यहां के करीब 115 प्रभावशाली लोगों ने सबको चौंकाते हुए एक साथ 115 मार्सिडीज बेंज कारों का ऑर्डर दिया है। भारत में एक साथ मर्सिडीज खरीदने वाले लोगों का सबसे बड़ा समूह है।


इस समूह में शुरुआत उद्योगपति, मीडियाकर्मी, निर्यातक, मकान-निर्माता, डॉक्टर्स और वकील मिलाकर 115 लोग हैं। इस 'औरंगाबाद ग्रुप' ने विलासिता वालीं कई कारें देखीं लेकिन अंत में सब मर्सिडीज़ कारें खरीदने पर सहमत हो गए।

पुणे में मर्सिडीज कारों के डीलर चंद्रबदन भंडारी ने कहा है कि इन सभी लोगों को अक्टूबर में दशहरा के पहले कारें दे दी जाएंगी। उन्होंने कहा कि यह एक साथ मर्सिडीज खरीदने वाला देश का सबसे बड़ा समूह है और हमने इन लोगों को बेहतरीन ऑफर भी दिया है। खरीदारों ने सात लोगों की एक टीम बनाई जिसने कंपनी से बेहतरीन डील के लिए मोलभाव भी किया।

अभी मर्सिडीज बेंज के 5 मॉडल बाजार में उपलब्ध हैं। ये हैं सी, ई, एम, एस और जीएल क्लास। इनकी कीमत 25 से 95 लाख के बीच है। मजे की बात यह है कि मर्सिडीज खरीदने वालों लोगों के समूह में पहले सिर्फ 15 लोग ही थे। लेकिन धीरे-धीरे इनकी संख्या 115 हो गई।

अब यह अलग बात है कि औरंगाबाद महाराष्ट्र के मराठवाड़ा इलाके के पिछड़े जिलों में से एक है! यहां पानी की कमी है। औद्योगिक विकास न के बराबर है। साथ ही गरीबी तो है।

Monday, March 22, 2010

देश की सुरक्षा दांव पर लगा मोबाइल कम्पनियों ने फर्जी नाम और पतों पर पांच करोड़ मोबाइल सिम जारी कर दिए

संचार क्रांति के नाम पर पैसा बटोरने में जुटीं सरकारी और गैर सरकारी मोबाइल कम्पनियों ने देश की सुरक्षा को भी दांव पर लगा दिया है। पैसा कमाने की होड़ तथा गला काट प्रतिस्पर्धा ने सारे नियम और कानून को ताक पर रख कर मोबाइल कम्पनियों ने देशभर में फर्जी नाम और पतों पर पांच करोड़ मोबाइल सिम जारी कर दिए हैं। फर्जी सिमकार्डो के दुरुपयोग पर दूर संचार नियामक आयोग (ट्राई) तब हरकत में आया जब इन सिमकार्डो का आतंकवादी गतिविधियों में प्रयोग होने की शिकायतें जोर पकड़ने लगीं।

दूर संचार मंत्रालय से प्राप्त जानकारी के मुताबिक फर्जी नाम और पते से सिमकार्ड बांटने वाली कम्पनी

  • एमटीएनएल पर 147.2 लाख,
  • बीएसएनएल 1388.53 लाख,
  • एयरटेल पर 1851.04 लाख,
  • रिलायंस कम्यूनिकेशन लिमिटेड पर 1341.46 लाख,
  • रिलायंस टेलीकम्यूनिकेशन लिमिटेड पर 63.03 लाख,
  • आइडिया पर 419.64 लाख,
  • डिसनेट पर 289.4 लाख,
  • वोडाफोन पर 909.15 लाख,
  • स्पाइस पर 78.31 लाख,
  • टाटा पर 518.२७ लाख,
  • एचएफसीएल पर 7.35 लाख,
  • लूप मोबाइल इंडिया लिमिटेड पर 38.43 लाख
  • सिस्टेमा श्याम टेलीसर्विसेज लिमिटेड पर 8.61 लाख
समेत कुल 7060.42 लाख रुपए का जुर्माना ठोंका है।

दूर संचार मंत्रालय के आडिट रिपोर्ट के अनुसार यह पता चला था कि देश के 25 करोड़ मोबाइल धारकों में 20 प्रतिशत यानि पांच करोड़ मोबाइल सिम फर्जी पतों पर जारी कर दिए गए। ट्राई ने मोबाइल कम्पनियों को बकायदा यह निर्देश जारी कर रखा था कि ग्राहकों को तभी कनेक्शन उपलब्ध कराया जाय जब उनके नाम और पतों का सत्यापन हो जाय। उसने जांच में फर्जी पाए गए प्रति कनेक्शन पर एक हजार रुपए से लेकर 50 हजार रुपए तक के जुर्माने की व्यवस्था की थी। दूरसंचार मंत्रालय व ट्राई की लापरवाही की ही वजह से सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की कम्पनियों ने पैसे कमाने की होड़ में देश की सुरक्षा को भी दांव पर लगा दिया।

डेली न्यूज़ में श्रीप्रकाश तिवारी की रिपोर्ट है कि लखनऊ निवासी एसपी मिश्र ने फर्जी सिमकार्डो का दुरुपयोग आतंकवादी गतिविधियों व अन्य कारणों से प्रयोग में लाने के मद्देनजर ही सूचना के कानून के तहत दूर संचार मंत्रालय से मोबाइल कम्पनियों पर की जाने वाली दंडात्मक कार्रवाई समेत अन्य विन्दुओं पर जानकारी मांगी थी। उन्होंने बताया कि देशभर में तकरीबन पांच करोड़ से अधिक फर्जी कनेक्शन दूर संचार मंत्रालय की आडिट रिपोर्ट में सामने आई थी। मगर दूर संचार मंत्रालय के अधिकारी बलविन्दर सिंह ने ऐसी किसी आडिट रिपोर्ट में फर्जी कनेक्शन से साफ इंकार किया है।

ग़रीबों की सही संख्या क्या? यह तो सरकार भी नहीं जानती: 1973 के मानदंडों पर ग़रीबी तय होती है!

भारत मे ग़रीबों की सही संख्या क्या है, और ग़रीबी तय करने के मापदंड क्या हैं, इन सवालों के जवाब अगर आप भारत सरकार से चाहते हैं तो उसका जवाब है कि देश मे फ़िलहाल कितने लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं इसका फ़िलहाल उसके पास कोई आंकड़ा मौजूद नही है। इतना ज़रूर बताया गया है कि वर्ष 2005 में 31 करोड़ 17 लाख लोग ग़रीबी रेखा के नीचे रहते थे. जहां तक सवाल है यह तय करने का कि कौन ग़रीब है, ये एक पेचीदा और तकनीकी विषय है।

ये जवाब केंद्र सरकार के योजना राज्यमंत्री वी नारायणस्वामी ने प्रश्नकाल के दौरान ग़रीबी तय करने मापदंड पर हो रही बहस पर दिए थे। सरकार की तरफ से बताया गया कि ग़रीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की पहचान करने और उसके मानदंड तय करने के लिए रमेश तेंदुलकर समिति का गठन किया गया है। इस कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद ही केंद्र सरकार देश में ग़रीबों की नई संख्या तय कर पाएगी।

हालांकि सरकार की तरफ से उन सवालों के कोई जवाब नही दिए गए जिनमे पूछा गया कि जब तक नए आंकड़े नही आ जाते, ग़रीबी रेखा के नीचे रहने वालों को सस्ते दर पर अनाज उपलब्ध कराने की क्या व्यवस्था है। भारत में ग़रीबों की संख्या को लेकर भ्रम की स्थिति कोई नई नहीं है. पिछले दिनों सरकार की तरफ से नियुक्त अर्जुन सेनगुप्ता समिति ने कहा था कि भारत में 70 प्रतिशत लोग 20 रुपए रोज़ से भी कम कमा पाते हैं।

ग़रीबी तय करने के मापदंड भी लगातार बदलते रहे हैं। पिछली तीन पंचवर्षीय योजनाओं को देखें तो वर्ष 1992 में आमदनी ग़रीबी मापने का तरीका था तो 1997 में ख़ुराक को इसका आधार बनाया गया। इसके बाद 10वीं योजना में 13 सवाल तय किए गए जिनके आधार पर घर-घर जाकर सर्वेक्षण कर ग़रीबों की संख्या तय करने का फ़ैसला किया गया।

सरकार की ग़रीबी तय करने के तरीके पर सुप्रीम कोर्ट ने भी सवाल उठाए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि एक किसी ग़रीब की बेटी स्कूल पढ़ने जाती है, सिर्फ़ इस आधार पर कैसे तय किया जा सकता है कि वो परिवार ग़रीबी के दायरे से बाहर है।

सरकार ग़रीबी मिटाने के मामले मे कितनी गंभीर है इस बात से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि फ़िलहाल सरकार 1973 के मानदंडों पर ग़रीबी तय करती है।

Sunday, March 21, 2010

चलती ट्रेन से टीटी ने एक दम्पति को बाहर फ़ेंक दिया

एक लोमहर्षक घटनाक्रम में पूर्व मध्य रेलवे के मुगलसराय रेलमंडल में सासाराम-सय्यद राजा स्टेशन के बीच चलती ट्रेन से टीटी ने एक दम्पति को बाहर फ़ेंक दिया जिससे पति की मौके पर ही मौत हो गयी। पुलिस सूत्रों के अनुसार उत्तरप्रदेश के चंदौली जिला के धीना थाना क्षेत्र के शिव शंकर और उसकी पत्नी संध्या देवी ने उत्तर प्रदेश के चंदौली जाने के लिए साधारण टिकट लेकर सासाराम रेलवे स्टेशन से हावड़ा-देहरादून एक्सप्रेस पकड़ा था। दोनों साधारण डिब्बे में की बजाय आरक्षित डिब्बे में चढ़ गए।

जब टीटीई ने उन्हें पकड़ा तो आरक्षित टिकट बनाने के लिए अतिरिक्त रुपये की मांग की लेकिन दंपति ने और रुपये देने से इंकार कर दिया। इससे नाराज होकर टीटीई ने उन्हें लालपुर रेलवे गुमटी के पास चलती ट्रेन से बाहर फ़ेंक दिया। श्री बारी की मौके पर ही मौत हो गयी जबकि उनकी पत्नी गंभीर रूप से घायल हो गयी।

दिल्ली पाकिस्तान में! कोलकाता बंगाल की खाडी में!!

सरकारी कामकाज किस तरह होते हैं, एक नमूना देखिए। पूर्वी रेलवे ने 20 मार्च को कोलकाता तथा दिल्ली के बीच चलने वाली लग्जरी गाड़ी महाराजा एक्सप्रेस के उद्घाटन समारोह के बारे में प्रमुख समाचार पत्रों में एक विज्ञापन दिया। विज्ञापन में एक नक्शे के जरिए रेलगाडी का मार्ग समझाते हुए दिल्ली को पाकिस्तान में तथा कोलकाता को बंगाल की खाडी में बताया गया। गाडी कोलकाता से नई दिल्ली जाएगी तथा इसमें गया, वाराणसी, खजुराहो, ग्वालियर के राज्य ही बदल दिए गए हैं।

विज्ञापन एजेंसी को विज्ञापन देने वाली पूर्वी रेलवे ने हालांकि इस पूरे मामले से अपना पल्ला झाड़ लिया है तथा दोष विज्ञापन तैयार करने वाली निजी एजेंसी के मत्थे मढ़ दिया है। पूर्वी रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी ने बताया कि जब यह विज्ञापन एजेंसी ने रेलवे को दिखाया था तो उसमें भारत का नक्शा ठीक था लेकिन बाद में कैसे उलट-पुलट गया। उन्हें समझ नहीं आ रहा है। उन्होंने कहा कि फिर भी उत्तर रेलवे इस गलती के लिए क्षमा प्रार्थी है। एडोनिक 76 विज्ञापन एजेंसी ने यह विज्ञापन बनाया था तथा भारत के नक्शे में शहरों के स्थान गलत दिखाना उनकी भारी गलती थी। इस विज्ञापन एजेंसी को काली सूची में डाल दिया गया है तथा उसे अब रेलवे का कोई काम नहीं सौंपा जाएगा।

गौरतलब है कि इस वर्ष जनवरी में महिला तथा बाल कल्याण मंत्रालय ने एक विज्ञापन छापा था जिसमें विभाग के विज्ञापन में पाकिस्तान के पूर्व वायुसेना प्रमुख तनवीर अहमद का चित्र भारत के विशिष्ट सपूतों वीरेन्द्र सहवाग, कपिल देव व अमजद अली के साथ दिखाए गए थे।

Saturday, March 20, 2010

मोबाईल के सहारे, सड़क या खेतों में बिना ड्राइवर के ट्रैक्टर चलेंगे

अब सड़क या खेतों में बिना ड्राइवर के ट्रैक्टर दौड़ता हुआ दिखाई दे तो चौंकियेगा नहीं, तकनीकी के इस दौर में यह संभव कर दिखाया है मोगा, पंजाब के लाला लाजपत राय पॉलीटेक्निक कॉलेज अजितवाल के दो छात्रों ने। उन्होंने एक ऐसा उपकरण तैयार किया है जो मोबाइल फोन के माध्यम से ट्रैक्टर को नियंत्रित करता है। मोबाइल फोन से ही ट्रैक्टर को स्टार्ट और बंद किया जा सकेगा और इसे सड़क या खेतों में दौड़ाया जा सकता है। 19 मार्च को कॉलेज परिसर में पवित्र सिंह और गुरदित्त सिंह ने तैयार किए गए उपकरण का प्रदर्शन कर सबको हैरान कर दिया।

दैनिक भास्कर में दीपक सिंगला की दिलचस्प रिपोर्ट में बताया गया है कि ट्रैक्टर को इन दोनों छात्रों ने मोबाइल की थ्री जी सेवा के साथ जोडा़ है। एक मोबाइल उपकरण ट्रैक्टर पर लगाया है जिसके कैमरे से ट्रैक्टर आगे की दिशा निर्धारित कर आगे बढ़ता है। ट्रैक्टर में भी गीयर और रेस, ब्रेक भी अपने आप ही लगते हैं।

मोबाइल फोन के माध्यम से ट्रैक्टर की पल-पल की स्थिति का भी पता लग सकेगा। दूसरे मोबाइल फोन से इस ट्रैक्टर को दुनिया के किसी भी स्थान पर बैठकर चलाया जा सकता है। इस प्रणाली को तैयार करने पर 95000 रुपये का खर्च आया है। दिलचस्प बात यह है कि अगर चलते हुए ट्रैक्टर के आगे कुछ दूरी तक कोई भी वस्तु आ जाती है तो वह वहीं रुक जाएगा। यह सेंसर के माध्यम से संभव हुआ है। सेंसर ट्रैक्टर के अगले हिस्से में फिट किए गए हैं।

इसे तैयार करने में तीन माह का समय लगा है। अभी 3 जी नेटर्वक सभी देश में सभी जगह उपलब्ध न होने के कारण कुछ मुश्किलें आ रही हैं लेकिन आने वाले समय में इसका लाभ कोई भी उठा सकेगा।