अपने पति के डेस्कटॉप कंप्यूटर में लगे अनगिनत तारों के कारण घर को ठीक से साफ न कर पाने से परेशान आंध्रप्रदेश में चित्तूर की भार्गवी ने एक अनोखे कंप्यूटर के विकास में सफलता हासिल की है। भार्गवी ने एक ऐसे सिंगल यूनिट पर्सनल कंप्यूटर का निर्माण किया है, जिसमें सामान्य पीसी के सारे गुण मौजूद हैं। लेकिन तारों की संख्या घटकर केवल एक रह गई है।
दिलचस्प यह है कि भार्गवी कोई कंप्यूटर इंजीनियर नहीं हैं। उन्होंने केवल 12वीं तक की पढ़ाई की है, और वह भी तेलुगु माध्यम में। भार्गवी के इस कंप्यूटर को कैबटॉप (कैबिनेट टॉप) कहा जा रहा है। यानी सामान्य पीसी का ही बदला हुआ एक रूप है। इसके सारे कल-पुर्जे सामान्य पीसी के ही हैं, लेकिन इनको एक साथ एक खास तरीके के बनाए हुए अकेले कैबिनेट में फिट किया गया है।
भार्गवी ने बताया कि शुरू में उनके पति और परिवार वालों को उनके विचार पर काफी हैरानी हुई। लेकिन जब उन्हें लगा कि इस विचार में दम है तो उन्होंने भार्गवी की काफी मदद की। एक साधारण कंप्यूटर की तरह ही कैबटॉप में कोर टू डुओ का प्रोसेसर, 2 जीबी रैम और 320 जीबी हार्ड डिस्क लगा है। इसे एक टीवी के तौर पर भी प्रयोग में लाया जा सकता है और सिस्टम को चालू किए बिना ही इस पर फोटोग्राफ भी देखे जा सकते हैं।
कैबटॉप के लिए तकनीकी सपोर्ट देने वाले भार्गवी के पति रंगा रेड्डी बताते हैं कि यह पूरा सिस्टम रिमोट कंट्रोल से भी चलाया जा सकता है और इसमें एक बिल्ट इन मल्टी मीडिया सिस्टम, टीवी तकनीक, स्पीकर और ऑटोमेटिक लॉक सिस्टम भी है। कैबटॉप बिजली की भी कम खपत करता और गर्म भी कम होता है। सबसे बड़ी बात है कि यह लैपटॉप की तरह पोर्टेबल है, लेकिन इसे लैपटॉप की तरह बैग की जरूरत नहीं होती।
यह नया पीसी केंद्रीय विज्ञान और तकनीक विभाग की देखरेख में टेक्नोप्रेनियर प्रोमोशन प्रोग्राम के तहत बनाया गया है। आंध्र प्रदेश के आचार्य नागाजरुन विश्वविद्यालय ने इसके प्रोटोटाइप के निर्माण के लिए शुरुआती पैसे दिए थे। इसे पेटेंट कराने के लिए रजिस्टर्ड करा लिया गया है। सेंट्रल मेकैनिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट, दुर्गापुर में हुए परीक्षणों में इसे कारगर पाया गया है। साधारण पीसी को कैबटॉप में बदलने के लिए दो हजार से सात हजार तक का खर्च आ सकता है।
(समाचारांश दैनिक भास्कर में अनुषा रवि की रिपोर्ट से साभार)
भारत की तलाश
Monday, May 10, 2010
चित्तूर की भार्गवी ने एक अनोखे कंप्यूटर के विकास में सफलता हासिल की
Monday, August 25, 2008
साइबर अपराध के इतिहास का सबसे दुस्साहसिक कदम, भारतीय के नाम
ब्रिटिश इतिहास में अब तक के सबसे बड़े साइबर अपराधों में से एक में भारतीय का हाथ होने का खुलासा हुआ है। यूं तो इंडियन आईटी प्रोफेशनल्स का लोहा पूरी दुनिया मानती है, लेकिन जरूरी नहीं कि प्रतिभा का इस्तेमाल हर बार सही काम के लिए ही हो। एक भारतीय हैकर पर लगभग 80 लाख लोगों की पहचान व उनका विस्तृत विवरण चुरा कर रूस के माफिया को बेचने का आरोप लगाया गया है। इससे करीब तीन अरब पाउंड यानी 2 खरब 43 अरब रुपये का नुकसान हुआ। साइबर क्राइम के इतिहास में इतने बड़े अपराध का कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता। इसे साइबर अपराध के इतिहास का सबसे दुस्साहसिक कदम बताया जा रहा है।
स्काटलैंड के संडे हेराल्ड के मुताबिक बृहस्पतिवार, 21 अगस्त की देर रात भारतीय मूल के एक हैकर ने बेस्ट वेस्टर्न होटल ग्रुप की आन लाइन बुकिंग प्रणाली की सुरक्षा कवच को भेद दिया। यही नहीं उसने इसकी संचालन प्रणाली का विस्तृत विवरण भी गुप्त नेटवर्क के माध्यम से रूसी माफिया को बेच दिया। इस हैकर को इससे पहले कोई नहीं जानता था। रिपोर्ट में उसके नाम का खुलासा नहीं किया गया है और न ही यह बताया गया है कि उसकी भारतीय पहचान कैसे स्थापित की गई।
इस साइबर हमले में 1,312 कांटिनेंटल होटलों के सभी ग्राहकों का व्यक्तिगत ब्यौरा चोरी कर लिया गया। ये सभी लोग 2007 से अब तक इन होटलों में ठहरे थे। चोरी हुई सूचनाओं में घर का पता, टेलीफोन नंबर, क्रेडिट कार्ड का विवरण और इनके पेशे का ब्यौरा शामिल है। कंप्यूटर सुरक्षा फर्म प्रीवक्स में काम कर रहे पूर्व हैकर और सुरक्षा विशेषज्ञ जैक्विस इरेस्मस ने बताया कि हैकर ने बहुत बड़ा हाथ मारा है। इरेस्मस ने कहा कि इन सूचनाएं का रूसी गिरोह ने दुरुपयोग भी शुरू कर दिया है। इनकी मदद से वे यूरोप में अपराधों की संख्या में जबरदस्त वृद्धि कर सकते हैं।
टाइम्स ऑफ़ इंडिया की ख़बर यहाँ पढी जा सकती है।
Thursday, April 17, 2008
भारतीय वैज्ञानिक बनाएगा दुनिया का सबसे तेज कंप्यूटर
भारतीय मूल का एक अमेरिकी वैज्ञानिक एक ऐसा कंप्यूटर बना रहा है जो मौजूदा पीढ़ी के सबसे तेज चलने वाले कंप्यूटर से भी हजार गुना ज्यादा तेजी से काम निबटाएगा। उताह विश्वविद्यालय के अशोक नाहटा द्वारा बनाई जा रही यह भविष्य की मशीन बिजली के तारों की बजाय, Infrared waves से भी आगे की T-rays से चलेगी।
नाहटा और उनके साथियों द्वारा विकसित किए जा रहे इस संयंत्र के विकास के बाद न केवल दुनिया में कंप्यूटरों का नक्शा ही बदल जाएगा बल्कि इसकी सहायता से बनने वाले सेंसर और स्कैनर जैविक, रासायनिक हथियारों को ढूंढ़ निकालने में भी कामयाब होंगे। नाहटा ने कहा, "हमने ऐसे सर्किट बनाने में सफलता प्राप्त करली है जिनकी सहायता से आगामी कुछ वर्षो में बेहतरीन क्षमता वाले कंप्यूटरों का विकास संभव होगा।"
विस्तृत जानकारी आप यहाँ पा सकते हैं, लेकिन इस शोध के निष्कर्ष शुक्रवार को आनलाइन जर्नल आप्टिक एक्सप्रेस में प्रकाशित किए जाएंगे।