आम आदमी की कार नैनो के प्रति दीवानगी में, जमशेदपुर में एक व्यक्ति ने अपनी जान दे दी। टाटा मोटर्स की बहुचर्चित लखटकिया कार के इस दीवाने ने अपनी कामकाजी बीबी द्वारा नैनो की बुकिंग के लिए रजामंदी नहीं जताने पर पिछले दिनों कथित तौर पर फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली।खबरों के मुताबिक नगर के सिदगोड़ा क्षेत्र में एग्रिको निवासी अरुण तिवारी (40) ने कुछ ही दिन पहले पत्नी से नैनो की बुकिंग कराने की मांग की थी। इस बात को लेकर उसके परिवार में पिछले तीन-चार दिन से विवाद चल रहा था। बताया जाता है कि नैनो की बुकिंग से इंकार किए जाने से अरुण का दिल ऐसा टूटा कि उसने अपने घर में पंखे से धोती का फंदा लगा कर आत्महत्या कर ली।
पेशे से एलआईसी एजेंट अरुण ने दो शादियां की थीं। उसकी दूसरी बीबी टाटा स्टील की सहायक कंपनी जुस्को में चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी है, जबकि पहली पत्नी घरेलू महिला है। नैनो की बुकिंग को लेकर दोनों पत्नियों में भी कहासुनी हुई थी। अरूण की कामकाजी बीबी ने उसे कुछ माह पहले ही एक मोटरसाइकिल दिलाई थी पर वह इसे बेच कर नैनो खरीदना चाहता था।
भारत की तलाश
Saturday, April 25, 2009
बीबी द्वारा नैनो की बुकिंग के लिए रजामंदी नहीं जताने पर फांसी लगा कर आत्महत्या
Sunday, October 19, 2008
एक बहादुर माँ को सलाम, जो वक्त का सामना नहीं कर सकी
व्यक्तिगत रूप में जब मैंने यह ख़बर पढ़ी तो मन भर आया या कहूं तो आंसू निकल पड़े। हुया यह कि पिछले तीन महीने से आईसीआईसीआई बैंक से एक भी लोन नहीं दिलवा पाने के कारण दो दिन तक भूखी रहने के बाद नीलम तिवारी उर्फ बीनू (35) ने फांसी लगाकर जान दी। अब इस परिवार में न तो कोई पुरुष है और न ही कोई कमाने वाला। दुनिया भर में जारी आर्थिक मंदी की राजधानी में पहली शिकार बनी मां की मौत के बाद 13 साल की बेटी नेहा अब गुमसुम है। 10 साल पहले आगरा में हुए ट्रेन हादसे में पिता को खोने के बाद अब उसकी मां नीलम भी नहीं रही। मौके से पुलिस को तीन स्यूसाइड नोट मिले थे।
बेटी नेहा को लिखे नोट में नीलम ने लिखा 'मैंने अब तक बहुत संघर्ष किया है। अब हिम्मत हार रही हूं। बेटा, आगे का सफर तुम्हें खुद तय करना होगा'।
मां को लिखे नोट में उसने माफी मांगते हुए लिखा कि 'दूर-दूर तक कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा। आपकी स्थिति भी ऐसी नहीं है कि कोई मदद कर सकें। मेरे पास न तो किराया देने के पैसे हैं और न खाने के। मेरे घर का सामान बेचकर मेरी बेटी की पढ़ाई का कम से कम यह साल जरूर पूरा करा देना'।
पुलिस को लिखे नोट में नीलम ने अपनी मौत का जिम्मेदार आर्थिक तंगी को बताया।
नवभारत टाइम्स में पंकज त्यागी द्वारा समाचार है कि द्वारका इलाके के सेवक पार्क में रहने वाली माया शर्मा के घर की स्थिति देखकर किसी भी संवेदनशील इंसान का दिल पिघल सकता है। घर में माया, उनकी अविवाहित बेटी और नेहा ही हैं। घर में कोई कमाने वाला इंसान नहीं है। नेहा विकासपुरी के कोलंबिया स्कूल में 9 वीं क्लास की छात्रा है। माया ने बताया कि नेहा पढ़ाई में बहुत होशियार है। आठवीं क्लास में उसके 95 फीसदी नंबर आए थे। अब वह इस स्थिति में नहीं हैं कि उसकी पढ़ाई जारी रखवा सकें। उन्हें उम्मीद है कि कोई गैर सरकारी संगठन नेहा की मदद करने आगे आएगा। नेहा ने बताया कि दो-तीन दिन से मां बहुत परेशान थी। उसने अपनी मां को फांसी पर लटके हुए देखा था। माया ने बताया कि नेहा के दिल पर उस मंजर का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा है। दो दिन से उसने कुछ नहीं खाया है।
नेहा की नानी, माया ने बताया कि नीलम इन दिनों खुद तंगी में होते हुए भी अपनी एकमात्र संतान नेहा की पढ़ाई जारी रखने की कोशिश में लगी हुई थी। मंदी में बैंकों से लोन दिलवा पाने में वह कामयाब नहीं हो पा रही थी। इस वजह से उसका कमीशन भी बंद हो गया था। माया शर्मा के मुताबिक लोन के कमीशन के अलावा नीलम की कोई कमाई नहीं थी। कुछ दिन तक तो वह अपनी माँ माया से रुपये लेती रही। लेकिन माँ की आर्थिक हालत खुद ही ठीक नहीं थी। उन्होंने बताया कि तीन महीने से नीलम बहुत परेशान थी। उसकी हालत पागलों जैसी हो गई थी। घर की हालत ऐसी थी कि कई बार तो नेहा को भी भूखा सोना पड़ता था।
कानपुर की रहने वाली नीलम की शादी 1994 में आगरा के रहने वाले दिलीप तिवारी से हुई थी। 1998 में आगरा में हुए ट्रेन हादसे में दिलीप की मौत हो गई। नीलम ने दूसरी शादी नहीं की और एक साल की बेटी को साथ लेकर मां और बहन के साथ दिल्ली आ गई। माया ने बताया कि उन्होंने नीलम से कई बार शादी करने के लिए कहा था, लेकिन वह तैयार नहीं होती थी। एक साल से उसने आईसीआईसीआई बैंक से लोन दिलवाने का काम शुरू किया था। लेकिन आर्थिक मंदी ने रोजी-रोटी का यह आसरा भी खत्म कर दिया।
ब्लॉग की दुनिया में हूँ, इसलिए ख़बर पढ़ते वक्त जिज्ञासा हुयी कि नारियों के ब्लॉग पता नहीं क्या प्रतिक्रिया दे रहे होंगे! लेकिन पाया कि उनकी आँख की किरकिरी तो मन्दिर और पब बने हुए हैं और एक महिला के संत होने को नमन कर रहें हैं या फिर नारियों के पहुँचने की छमाई ट्रैफिक रिपोर्ट दे रहे हैं और स्त्री के वस्त्रों के अनुपात से उसके चरित्र की पैमाईश पर बहस कर रहे। एक आशा भरी उम्मीद लेकर गया था, पर निराशा हाथ लगी।
भरे मन से सोच रहा था कि कितनी टूट चुकी होगी ये बच्ची? कैसे उसकी मदद के लिए हम आगे आएं। तभी एक अपडेट मिला कि अगर आप इस बच्ची नेहा की मदद करना चाहते हैं तो उनकी नानी से इस नंबर पर संपर्क कर सकते हैं: 09811544027
Wednesday, April 2, 2008
हमारे (भावी) प्रधानमंत्री !?
विपक्ष के नेता लाल कृष्ण आडवाणी की हाल ही में आई किताब माई कंट्री, माई लाइफ में भगत सिंह के बारे में दी गई गलत जानकारी पर इतिहासकारों ने नाराजगी जताई है। शहीद-ए-आजम के पौत्र यादविंदर सिंह संधू ने भाजपा नेता से अपनी गलती स्वीकार करने को कहा है। आडवाणी ने किताब के अध्याय भारत और पाकिस्तान में पेज नंबर 792 पर लाहौर का जिक्र करते हुए लिखा है कि ब्रिटिश हुकूमत ने भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव को लाहौर में सिर्फ इसलिए फांसी दे दी, क्योंकि उन्होंने सेंट्रल असेंबली में बम फेंककर गोरी हुकूमत का विरोध किया था। प्रधानमंत्री पद के भाजपा उम्मीदवार आडवाणी की जानकारी पर इसलिए प्रश्नचिह्न लग रहा है क्योंकि भगत सिंह को सेंट्रल असेंबली में बम फेंकने के मामले में नहीं, बल्कि लाहौर षड्यंत्र मामले [सांडर्स हत्याकांड] में फांसी की सजा सुनाई गई थी।
शहीद भगत सिंह के भतीजे बाबर सिंह संधू के पुत्र यादविंदर सिंह संधू ने कहा है कि आडवाणी को किताब में भगत सिंह से संबंधित कुछ भी लिखने से पहले ऐतिहासिक तथ्यों को जान लेना चाहिए था। इतने बड़े नेता से ऐसी गलती की उम्मीद नहीं की जा सकती है, इसलिए उन्हें अपनी गलती स्वीकार करनी चाहिए। शहीद भगत सिंह से संबंधित घटनाओं पर शोध करने वाले जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर चमन लाल ने कहा कि राजनेताओं को ऐतिहासिक तथ्यों को पढ़े बिना ही लिखने की आदत पड़ गई है।